Back to feed

श्रृंगार

जो सभी यूं ही चाहें मुझको तो क्यूँ ही मैं श्रृंगार करूँ

मन का श्रृंगार तो जानो तुम तन के श्रृंगार के आगे हैं

मैं लाल- गुलाबी क्यूँ पहनूँ जब श्वेत भी मुझ पर जंचता है

उस कंगन को मैं क्यूँ खनकाऊँ जो साड़ी में मेरी फंसता है

रत्न जड़ित हार मैं पहनूँ क्यूँ जो रोके मेरे ऊंचे स्वर को

वो कमरबंद मैं बांधू क्यूँ जिसमें ना आये कमर मेरी

क्यूँ पहनूँ मैं ऐसी पायल जिन्हें पहन के मैं ना दौड़ सकूँ

मैं ऐसे केश संवारू‌ क्यूँ जैसे में सबको रचता है

मैं क्यूँ ना उनको बांधू ऐसे जैसे मुझको सुविधा है

चेहरे के कुछ निशानों मैं छुपाऊँ ही क्यूँ अगर उनसे भी सब प्रेम करे

मैं मन का श्रृंगार करू निशदिन जो सब मन को मेरे प्रेम करे

श्रृंगार रुचि है, गौरव है और स्वाभिमान है हर सजनी का

नहीं श्रृंगार बंधन समाज का ना अधिकार किसी साजन का

Baatcheet