विजय शर्मा एरी सूर्य करेगा अगवानी, फिर चाँद नज़र उतारेगा,
हर बालक देश की रक्षा हेतु देखो अब हुंकारेगा।
सर पर होगा कफ़न हमारे, हाथ कलावा धारेगा,
माँ की आँखों का आँसू, वीरता में रंग उतारेगा।धरती माँ की गोदी में, बलिदान की गाथा गूँजेगी,
हर सीमा पर शौर्य की, अमर कहानी लिखी जाएगी।
कफ़न ओढ़े वीर सपूत, हँसते-हँसते रण में जाएँगे,
जननी के आशीष से, अमरत्व का वर पाएँगे।गगन गवाही देगा, जब रक्त मिट्टी में मिल जाएगा,
हर कण में देशभक्ति का दीपक फिर जल जाएगा।
कफ़न नहीं है अंत यहाँ, ये तो आरंभ पुकारेगा,
हर बलिदान से नया भारत, और भी उजियारेगा।शिशु की किलकारी में, शौर्य का स्वर गूँज उठेगा,
हर घर में गाथा बलिदान की, दीपक सा जल उठेगा।
कफ़न ओढ़े वीर जवान, जब रणभूमि में उतरेंगे,
तोपों की गड़गड़ाहट में, अमर गीत वे गाएँगे।माँ की ममता रोकेगी, पर कर्तव्य आगे बढ़ेगा,
हर आँसू में संकल्प नया, हर दुख में दीप जलेगा।
कफ़न नहीं है मृत्यु यहाँ, ये तो जीवन का उत्सव है,
बलिदान से ही राष्ट्र खड़ा, यही वीरों का धर्म है।हर पर्वत, हर नदी, हर कण गवाही देगा,
कफ़न ओढ़े सपूतों का, इतिहास अमर रहेगा।
रक्त से सींची मिट्टी में, स्वतंत्रता फूल खिलाएगी,
हर बलिदान की गाथा, पीढ़ियों को राह दिखाएगी।वीर जवान जब हँसते-हँसते रण में गिर जाएँगे,
कफ़न ओढ़े अमरत्व की ओर कदम बढ़ाएँगे।
उनकी गाथा गूँजेगी, हर गीत और हर कथा में,
उनकी शौर्यधारा बहती रहेगी हर दिशा में।कफ़न नहीं है शोक यहाँ, ये तो गौरव का प्रतीक है,
हर बलिदान से राष्ट्र खड़ा, यही जीवन का संगीत है।
वीरता की धारा बहती, हर सीमा पर गूँज उठेगी,
कफ़न ओढ़े सपूतों की गाथा अमरत्व लिखेगी।हर जननी का आशीष, हर पिता का गर्व बनेगा,
कफ़न ओढ़े वीर जवान, अमर गाथा रच देंगे।
धरती माँ की गोदी में, बलिदान का दीप जलेगा,
हर पीढ़ी को प्रेरणा का अमर संदेश मिलेगा।कफ़न नहीं है अंत यहाँ, ये तो जीवन का उत्सव है,
हर बलिदान से राष्ट्र खड़ा, यही वीरों का धर्म है।
सूर्य करेगा अगवानी, फिर चाँद नज़र उतारेगा,
कफ़न ओढ़े वीर जवान, अमर गाथा गाएँगे।यह कविता शौर्य, बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण की अमर गाथा है।