आख़िरी ख़त
आख़िर मान ही लिया मैंने—
कि अब हम साथ नहीं चल पाएंगे…
कितना भी चाहा समझना,
पर हम एक-दूसरे को समझ नहीं पाएंगे।
शुक्रिया तुम्हारा—
मोहब्बत का मतलब सिखाने के लिए,
और उसी मोहब्बत में
दर्द का स्वाद चखाने के लिए।
अब मैं थोड़ा दूर जा रहा हूँ,
शायद मेरी दूरी ही तुम्हें सुकून दे…
तुम अपनी दुनिया में आज़ाद रहो,
यही दुआ अब हर सांस में रहे।
हमने जो ख्वाब सजाए थे,
वो अधूरे ही रह गए…
पर यकीन मानो—
हर मोड़ पर मैंने उन्हें पूरा करने की कोशिश की थी।
मेरा ये सफर यहीं ठहरता है,
पर तुम्हारी खुशियों की दुआ कभी नहीं रुकेगी…
तुम हँसते रहो, खिलते रहो,
मेरी खामोशी में भी तुम्हारी ही रौशनी होगी।
तुम्हारी कमी चुभेगी—
शायद हर रोज़, हर रात…
मगर मैं जीना सीख लूँगा,
उस सन्नाटे के साथ…
जो तुम मेरी दुनिया में छोड़ गए हो।
ये आख़िरी अल्फ़ाज़ हैं मेरे—
ना कोई शिकायत, ना कोई गिला…
बस एक दुआ है, एक सच्चा सा जज़्बा—
तुम खुश रहना…
यही मेरी मोहब्बत का
आख़िरी सिलसिला।
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मर्म (Moral):
हर प्यार मुकम्मल नहीं होता, लेकिन सच्चा प्यार हमेशा दुआ बनकर रह जाता है—चाहे लोग साथ रहें या नहीं।