
देवप्रयाग से ऊपर, जहाँ नेटवर्क की आखिरी डंडी भी साथ छोड़ देती है, वहाँ बसा है 'सिल्टा' गाँव। अठारह साल का धीरज इस वक्त अपनी फटी हुई जैकेट में सिकुड़ा हुआ था। कमरे के कोने में रखी ढिबरी की मद्धम रोशनी में उसने अपनी माँ के काँपते हाथों को देखा, जो पिछले तीन दिनों से तेज बुखार में तप रही थीं।
गाँव में कोई डॉक्टर नहीं था। शहर जाने के लिए बस सुबह मिलती थी और जेब में कुल जमा अस्सी रुपये थे। धीरज ने खिड़की से बाहर देखा; दिसंबर की सर्द रात में बर्फबारी शुरू हो चुकी थी।
"धीरज... तू सो जा बेटा। सुबह मजदूरी पर भी जाना है," माँ ने खाँसते हुए कहा।
धीरज की आँखों में आँसू आ गए। उसके पिता चार साल पहले एक पहाड़ी हादसे में चल बसे थे। तब से, पहाड़ी खेतों की सूखी मिट्टी और गाँव के ठेकेदार की गालियाँ ही उसकी जिंदगी थीं। लेकिन आज उसने एक फैसला कर लिया था। उसे इस गरीबी के पहाड़ को तोड़ना ही होगा।
सुबह की पहली किरण के साथ ही धीरज ने माँ के पैर छुए, अपना पुराना पिट्ठू बैग उठाया और बिना किसी को बताए दिल्ली जाने वाली बस में बैठ गया। उसकी आँखों में बड़े शहर के सपने नहीं, बल्कि अपनी माँ को एक सम्मानजनक जिंदगी देने की जिद थी।
दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे पर जब वह उतरा, तो गाड़ियों का शोर और ऊँची इमारतें देखकर उसका सिर चकरा गया। वह सीधे एक कबाड़ी बाजार के पास बने ढाबे पर पहुँचा।
"काम मिलेगा साब? कुछ भी कर लूँगा," धीरज ने ढाबे के मालिक, एक कड़क मिजाज अधेड़ उम्र के आदमी से पूछा।
मालिक ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, "पहाड़ी हो? बर्तन धोने होंगे, कोयला ढोना होगा। रात को यहीं फर्श पर सोना होगा। महीने के तीन हजार मिलेंगे। मंजूर है?"
धीरज ने बिना सोचे हाँ कह दिया। उसे लगा कि उसकी मुश्किलों का अंत हो रहा है, लेकिन उसे क्या पता था कि दिल्ली की यह चकाचौंध उसके लिए एक ऐसा जाल बुन रही थी, जहाँ से निकलना नामुमकिन होने वाला था।
आगे क्या हुआ?
महीने के अंत में जब धीरज ने अपनी पहली सैलरी माँ को भेजने के लिए माँगी, तो ढाबे के मालिक ने एक ऐसा सच सामने रखा जिसने धीरज के पैरों तले से जमीन खिसका दी। जानने के लिए पढ़ें अगला भाग!