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उलझन

दिन थका सा था

पर मन की चहक

इंतजार करती थी

उस बस

जो ज़िंदगी को मुझ तक लौटा लाती थी..।।

वो नन्हें नन्हें हाथ

जो मुझे जकड़े रहते थे

वो अब मुझे ही समेट लेते हैं

जब भी कोई संकट

मुझ तक आने की कोशिश करता है.।।

मेरी परी कब मेरी

रक्षा कवच बन गयी

मेरी चिरैया

कब मेरी शेरनी बन गयी

पता ही नहीं चला..

पर दुख बहुत देखा...

बहुत कुछ सहा...

और सशक्त बहुत हो गयीं तुम..

बस एक उलझन है...

तुम्हें छोड़ कर जाया नहीं जाता

और तुम्हें साथ ले जा नहीं सकती.।।

मां हूँ ना

हर हाल में अनंत प्यार केवल

तुम्हीं से करती हूँ

केवल तुम्हीं से..।।

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