Back to feed

खाक़ी

रहा हूँ दौड़ दिन और रात ख़ाकी तुझको पाने को

अगर तू मिल न पाई मैं कहूँगा क्या ज़माने को

जो सोते चैन से समझेंगे क्या मेरी वो हालत को

है दफनाए कई सपने बस इक सपना सजाने को

कभी धूपों ने तोड़ा है कभी सर्दी ने मारा है

निकलता रोज हूँ फिर भी मै खुद को आजमाने को

के छाले पड़ गए पैरों में पर साँसों में अग्नि है

ये लड़का हारता है रोज बस खुद को जिताने को

मेरी माँ की दुआएं हैं जिन्होंने थाम रक्खा है

बड़ी आतुर थी ये दुनिया मुझे नीचे गिराने को

जो कहते छोड़ दे माही वो क्या जाने ये ज़िद कैसी

हाँ पैदा ही हुआ हूं बस तुझे ख़ाकी मैं पाने को

Baatcheet