
आखिर इंसान ही तो हूँ, ख़ुदा तो नहीं...
तुम समझते हो, उतना बुरा तो नहीं....
तेरी नज़र में मेरी जो गलतियां हैं..
हो सकता है वो गलतफहमियां हैं..
शत प्रतिशत सही हूँ
यह दावा नहीं करता..
जो भी हूँ, यही हूँ
दिखावा नही करता...
मैं जो करता हूँ
जमाना नही करता..
सच ही कहता हूँ
बहाना नहीं करता...
तेरी जुबान पर मेरा नाम नहीं,
भला ऐसा क्यों?
जो मैं कहूँ सब गलत, तुम सही,
भला ऐसा क्यों?
मै सबकी सुनू,
आखिर मेरी कोई क्यों नहीं सुनता?
मै क्योंकि कभी?
किसीको पूछ कर सपने नही बुनता?
इस भीड़ में,
मै तन्हा रोज़ चलता हूँ
तुझे पता हैं क्या?
तीरगी में,
दीया सा रोज जलता हूँ
इसमें खता हैं क्या?
क्या फर्क पड़ता हैं,
हवा तेज है
मै बुझा तो नहीं..
इंसान ही तो हूँ आखिर
ख़ुदा तो नही...?
मेरी जिंदगी खुली किताब हैं,
कोई पढ़ कर समझता क्यू नहीं?
हाँ, अगर कुछ पन्ने बिखरे हैं,
कोई थम कर समेटता क्यू नहीं?
मेरी जुबान से निकला बोल
टाल देते हो..!
बेजवाब सवालों का बोझ
डाल देते हो..!
माना बहुत अकेला हूँ,
तो क्या हुआ..
मै खुद से आखिर
जुदा तो नहीं...
किसी ने जगदीश को ईश्वर माना
किसी ने कण कण में शंकर माना
मैने तेरी खुदगर्ज आंखों में देखा...
उन्हीं आँखों को मैने अम्बर माना...!
उसी अम्बर में उड़ने का सपना था
तो था..
मैरी अंधी आँखो में कोई अपना था,
तो था...
अब फिर देखूं कोई सपना आप सा
उसी सपने में कोई अपना सांप सा
चाहू तो भी कोई सपना पाल नही सकता,
अपने जहन में कोई तमन्ना डाल नही सकता?
अब मै खामोशी की आवाज सुन लेता हूँ
अपनी लिखी गज़ल, खुद ही सुन लेता हूं
कोई पूछे? हार बैठे हो खुद को ?तो कहता हूँ
खेला जिंदगी से ही तो हूँ आखिर,
जुआ तो नहीं..."!!
आखिर इंसान ही तो हूँ, ख़ुदा तो नहीं...!
तुम समझते हो, उतना बुरा तो नहीं....!!