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“मेरी पहली नौकरी — एक अनमोल कहानी”

“मेरी पहली नौकरी — एक अनमोल कहानी”

बिहार के एक छोटे से गाँव की गलियों में पली-बढ़ी मैं, अक्सर आसमान को निहारते हुए बड़े सपने देखा करती थी। मन में एक ही विश्वास था कि जीवन में कुछ ऐसा करना है जिससे अपने अस्तित्व को एक नई पहचान दे सकूँ। समय के साथ पढ़ाई पूरी हुई और एक दिन वह अवसर आया, जब मुझे अपने गाँव की सीमाओं को छोड़कर एक नए सफ़र पर निकलना था।

मेरी मंज़िल थी हैदराबाद।

घर से दूर जाने का उत्साह भी था और मन में अनगिनत प्रश्न भी। एक छोटे गाँव से निकलकर इतने बड़े शहर में जाना मेरे लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। हर रास्ता नया था, हर चेहरा अनजान था, लेकिन मेरे भीतर का विश्वास मुझे आगे बढ़ने की शक्ति देता रहा।

जीवन की पहली कमाई की शुरुआत एक प्रशिक्षु के रूप में हुई। उस समय शायद मुझे यह नहीं पता था कि मैं केवल नौकरी नहीं करने जा रही हूँ, बल्कि जीवन का एक नया अध्याय सीखने जा रही हूँ। वहाँ पहुँचकर मैंने महसूस किया कि वास्तविक शिक्षा केवल पुस्तकों में नहीं होती, बल्कि अनुभवों में छिपी होती है।

जिस संस्थान में मैंने कदम रखा, वह एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम था। वहाँ का वातावरण देखकर मन गर्व से भर गया। ऐसा लगा जैसे वर्षों की मेहनत ने मुझे सही स्थान तक पहुँचा दिया हो। संस्थान का हर कोना नई तकनीकों, नए प्रयोगों और नए अवसरों से भरा हुआ था।

शुरुआती दिनों में हमारी प्रयोगशाला में अधिकतर कागज़ी प्रक्रियाएँ ही चल रही थीं। परियोजना अभी नई थी और उस पर कार्य आरम्भिक चरण में था। यह परियोजना जहाज़ों से जुड़े एक महत्वपूर्ण Weapon Control System से संबंधित थी। उस समय तकनीकी कार्य कम और सीखने की प्रक्रिया अधिक थी, लेकिन मैंने हर छोटे अनुभव को भी एक अवसर की तरह अपनाया।

दिन बीतते गए और धीरे-धीरे मुझे तकनीक की उस दुनिया को और गहराई से समझने का अवसर मिलने लगा। कुछ महीनों बाद मुझे DC-DC Converter Panel पर कार्य करने का अवसर मिला। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था। मैंने पहली बार तकनीकी परीक्षणों को इतने निकट से समझा। डिजिटल परीक्षणों की बारीकियाँ सीखीं, साथ ही मैन्युअल परीक्षणों की प्रक्रिया को भी समझा।

हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता था। कभी कोई समस्या सामने आती तो उसे हल करने में घंटों लग जाते, लेकिन जब समाधान मिल जाता, तो आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता। धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती।

इस पूरे सफ़र में मेरे वरिष्ठ अधिकारी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने केवल कार्य सिखाया ही नहीं, बल्कि सीखने का सही दृष्टिकोण भी दिया। जब कभी कोई कठिनाई आती, उनका मार्गदर्शन मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता। उनके विश्वास ने मुझे अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना सिखाया।

लेकिन इस नौकरी ने मुझे केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं दिया।

इसने मुझे ऐसे मित्र भी दिए, जिन्होंने परिवार से दूर होने का एहसास कभी होने नहीं दिया। हम साथ काम करते, साथ सीखते और एक-दूसरे की खुशियों तथा चुनौतियों में सहभागी बनते। उनका स्नेह और सहयोग मेरे लिए उस नए शहर में एक परिवार की तरह था।

इन्हीं दिनों मेरे भीतर छिपी कवयित्री ने भी अपनी पहचान बनानी शुरू की। काम के बीच, अनुभवों के बीच और जीवन की नई सीखों के बीच मेरी कलम भी चलने लगी। जो भाव पहले केवल मन में रहते थे, वे शब्दों का रूप लेने लगे। मेरी कविताएँ लोगों तक पहुँचने लगीं और मुझे महसूस हुआ कि तकनीक के साथ-साथ साहित्य भी मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

यहीं से मेरी कलम ने अपनी असली ताकत पहचानी।

आज जब मैं पीछे मुड़कर उस सफ़र को देखती हूँ, तो समझ पाती हूँ कि मेरी पहली नौकरी केवल वेतन पाने का माध्यम नहीं थी। वह मेरे व्यक्तित्व के निर्माण की पाठशाला थी। वहीं मैंने आत्मनिर्भर होना सीखा, संघर्षों का सामना करना सीखा, लोगों को समझना सीखा और स्वयं पर विश्वास करना सीखा।

बिहार के एक छोटे से गाँव से निकलकर हैदराबाद तक की वह यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं थी, बल्कि एक साधारण लड़की के आत्मविश्वास, ज्ञान और सपनों के विस्तार की यात्रा थी।

  • और शायद इसी कारण मेरी पहली नौकरी आज भी मेरे जीवन की सबसे सुंदर स्मृतियों में से एक है, क्योंकि वहीं मैंने जाना था कि सपनों की उड़ान गाँव या शहर की मोहताज नहीं होती—उसे केवल विश्वास, परिश्रम और अवसर की आवश्यकता होती है।

  1. “मेरी पहली नौकरी — एक अनमोल कहानी”

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