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एक रूह, जो रह गई पीछे”

“एक रूह, जो रह गई पीछे”

जिस दिन मैंने तुम्हें देखा,

उसी दिन दिल ने ये स्वीकारा।

तुम्हें अपनाया मन से,

रिश्ते को जोड़ा तन-मन से।

हर हाल में साथ निभाना था,

वक़्त चाहे जैसा भी आना था।

बीमारी हो या जीवन की आंधी,

साथ चलने की थी हमने शपथ बांधी।

कहा गया — “कुछ दिन मायके रहो,”

बस दो महीने, फिर लौट आओ।

तुमने कहा — "कभी भी बुलाओ,

मैं आ जाऊँगा, तुम्हें ले जाऊँगा।”

पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया,

तुम्हारा बोलना ही जैसे मुरझा गया।

फोन उठाना बंद, जवाब नहीं,

एक सन्नाटा रह गया कहीं।

और फिर आया वो कागज़ एक दिन,

जिसने तोड़ दिए सारे सपनों के बंधन।

तलाक? ऐसा शब्द क्यों आया,

जिस प्यार पर भरोसा था, वो क्यों डगमगाया?

मैंने अदालत में नहीं, तुम्हारे दिल में विश्वास किया,

उस वादे में जो तुमने विवाह के वक़्त लिया।

तुमने कहा था — "अब दो नहीं, एक रूह हैं हम,”

फिर कैसे एक रूह ने दूसरी को कर दिया ग़म?

तुमने मुझे नहीं, खुद को भी दुखी किया,

क्योंकि जो रूह जुड़ी थी, वो भी टूट गई थी वहीं।

अब मैं बस एक सवाल पूछता हूँ —

क्या ये प्यार था... या कोई अधूरा सपना था?

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