
हद में रहना सीख लिया…
अब हर किसी से
ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद नहीं रखती,
और हर बात पर
खुद को साबित करने की जिद भी नहीं।
जहाँ अपनापन हो
वहाँ दिल खोल देती हूँ,
और जहाँ क़दर न हो
वहाँ ख़ामोशी ओढ़ लेती हूँ।
हद में रहना सीख लिया है मैंने—
अब न टूटती हूँ,
न ज़रूरत से ज़्यादा झुकती हूँ।“हद में रहना”
कभी कमज़ोरी नहीं होता…
वो तो खुद की इज़्ज़त बचाने का तरीका होता है।
हर किसी को हर हक़ देना ज़रूरी नहीं,
और हर रिश्ते में खुद को मिटाना भी सही नहीं।
जहाँ बात की क़दर ख़त्म हो जाए,
वहाँ हद एक दीवार नहीं—
बल्कि सुकून की लकीर बन जाती है।
क्योंकि
हद में रहना
किसी को दूर करना नहीं,
खुद को बचाना होता है। 🌿