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प्राकृतिक सन्देश

प्राकृतिक सन्देश

दीपक की लौ में भी संघर्ष लिखे जाते हैं,

रात की ख़ामोशी में उत्कर्ष लिखे जाते हैं,

जो सीख ले मुश्किलों से निकलकर चलना,

उनके जीवन-पृष्ठों पर सुख–हर्ष लिखे जाते हैं।

हवाओं की सरसराहट में भी संवाद होते हैं,

पेड़-पौधों के भी आपस में वाद होते हैं,

जो सुन सके प्रकृति के मौन की गूढ़ भाषा,

उनकी हर आहट में सुकून भरे नाद होते हैं।

पेड़ों की छाँह में भी उपदेश बसते हैं,

माटी की ख़ुशबू में गहरे संदेश रचते हैं,

जो समझ सके प्रकृति के सौंदर्य की प्रेरणा,

उनके जीवन में सुंदर परिवेश सजते हैं।

नदियों की धार में भी इकरार बहते हैं,

पत्थर की चुप्पी में भी स्वीकार रहते हैं,

जो मौन की भाषा को हृदय से समझ पाए,

क्योंकि ख़ामोशी में ही सच्चे संवाद रहते हैं।

पंछी की चूँ-चूँ में भी अल्फ़ाज़ होते हैं,

बिन शब्दों के भी बोली के साज़ होते हैं,

ये प्राणी अकसर इंसानों से अच्छे होते हैं,

उनकी ख़ामोशी में ख़्वाबों के परवाज़ होते हैं।

© डॉ• राहुल शुक्ल ‘साहिल’

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