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वो इंसान

एक इंसान जिसने मुझे हँसना सिखाया,

हर मुसीबत से मुझे बचना सिखाया,

उसने सिखाई सीख मुझे बोलने की,

हक के लिए उसने मुझे लड़ना सिखाया।

मैं नादान थी दुनिया की रीत से परे,

भरी भीड़ में उसने मुझे चलना सिखाया,

मैं तो यूंही मुस्कुराती थी गगन में देखकर पंछी,

पर दिए उसने मुझे उड़ना सिखाया।

जब खुद को अकेले जान मैं रो देती थी,

वही था जिसने मेरा था साथ निभाया,

मैं तो एक कच्चे घड़े सी मिट्टी थी,

उसने ही बर्तन सा मुझे था तपाया।

वो एक पेड़ के जैसे मुझे रखते थे छांव में,

बदन अपना था उसने कड़ी धूप में जलाया,

यूँ तो मैं जी रही थी जिंदगी हर हाल में,

वो पापा है मेरे जिसने शान से जीना सिखाया।।

–कंचन चाबुक✍️

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