
और यदि ऐसा न भी हो, तब भी उस ज्ञान की कोई क़ीमत नहीं रह जाती, और लोग प्रशंसा करने के बजाय परिहास उड़ाते हैं।
विद्वता के साथ सरलता और विनम्रता बहुत ज़रूरी है; बल्कि इन दोनों पहलुओं का सामंजस्य अति आवश्यक है। यह गुण मिलते हैं, तो कोई सुकरात या अरस्तू होता है; अन्यथा विद्वता और विद्वान की गरिमा का ह्रास होता है, और समाज पाखंडियों व जाहिलों का महिमामंडन करने लगता है।
इसलिए अत्यंत आवश्यक है कि ज्ञान और विद्वता के साथ-साथ विवेक और विनम्रता को भी व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनाए रखा जाए।
@अर्शिया अंजुम