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सारी उम्र भागम-भाग में

मेरी माँ का जीवन

माँ का घर है ये,मायका है मेरा l

कच्चे घर मे मिट्टी से माँ ने चूल्हा एक.बनाया l

मिट्टी को अपने हाथों से गुंथ कर दीवारों को सजाया l

सारी उम्र भागम-भाग में खुद को कभी ना सजाया l

चौकड़ी पर बैठ कर अपनी फूंक से चूल्हा माँ ने सुलगाया l

लकड़ी दे दे कर हाथो से चूल्हा माँ ने जलाया l

सारी उम्र भागम-भाग में सपनों को अपने दबाया l

थाली में आटा गूंथा हंडी मे सब्जी को पकाया l

रोटी को आकार देती सब्जी को स्वाद बनाया l

सारी उम्र की भागम-भाग खुद का शरीर बेडोल बनाया l

खुद अखिर में खाया पहले सबको खिलाया l

बच्चो और घर की जिम्मेदारी को अपना फर्ज बनाया l

सारी उम्र की भागम-भाग में खुद का मर्ज भी भुलाया l

इकट्ठा किए बर्तन बर्तनों को साफ़ किया l

घिस घिस कर काले बर्तन,बर्तनों को चमकाया l

सारी उम्र भागम-भाग मे हाथों से अपनी लकीरों को मिटाया l

सारी उम्र रिश्ते नाते बुनते बुनते जिम्मेदारी को निभाया l

रातों को जागजाग दिन रात मेहनत करके हमें पढ़ाया l

सारी उम्र भागम-भाग में खुद को इतना सताया l

हमारे सपने पूरे करने के लिए दिनरात एक किया l

जीवन सरल बने हमारा इस लायक हमे बना दिया l

सारी उम्र भागम-भाग में जीवन अपना सारा हम पर वार दिया l

अपना सारा जीवन दुख तकलीफ मे बीता दिया l

पर हमारी जिंदगी को खुशियो से सजा दिया l

सारी उम्र भागम-भाग मे जीवन अपना गंवा दिया l

तकलीफें खत्म हो जब अच्छा समय आ गया l

सुख भोगने के दिनों में शरीर ने साथ छोड दिया l

सारी उम्र भागम-भाग में बीता आत्मा ने भी साथ छोड दिया l

चली गई माँ पुकारता चूल्हा दीवारें और बर्तन l

वही रखे आज भी कर रहे हें उनका इंतजार l

सारी उम्र भागम-भाग में दिया जिन्होंने उनका साथ l

रह गया घर वो कच्चा चूल्हा जिसे हाथों से बनाया था l

खुल गई पर्तें दीवारों की जिसको हाथों से सजाया था l

सारी उम्र भागम-भाग मे बीती घर वो अब खण्डहर हो गया

बुझ गया चूल्हा माँ के साथ जिसे अपनी सांसो से चलाया था

रह गयी चौकड़ी बर्तन रह गया वो दर और द्वार जिसे माँ ने बनाया था l

सपनों से सजा आशियाना आज समय की गर्त में समा रहा

नया मकान जगह ले भी ले अब पर माँ की वो कुर्बानी वो यादे नहीं मिलेगी अब l

सारी उम्र भागम-भाग कर माँ ने जिसे बनाया था l

काजल मनीष जैन

राजस्थान

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