
इसी वर्ष, अस्सी वर्षों से अधिक समय की प्रभुता के बाद “नई दुनिया” एक बीता हुआ स्वप्न बनती हुई प्रतीत हो रही है। पता नहीं Christopher Columbus अपनी कब्र में क्या सोच रहे होंगे।
अंकल सैम की टोपी अब जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है। उनका टेलकोट जगह-जगह से घिस गया है, जूतों के तलवे टूट चुके हैं, और छड़ी को दीमक चाट रही है। स्वयं उनकी सेहत भी डगमगा चुकी है—फेफड़े गल गए हैं, पर उनकी आवाज़ की गूँज को कृत्रिम रूप से शेर की दहाड़ बना कर पेश किया जा रहा है। बिल्लियाँ और गीदड़ अब उस आवाज़ की खोखलाहट पहचान चुके हैं। जंगल का भय जैसे समाप्त हो गया है। सन्नाटा तो है, पर उसकी रहस्यमयता अब दम तोड़ रही है। चूहे, गिलहरियाँ और भालू अपने भीतर किसी नई स्वतंत्रता की आहट सुन रहे हैं। जंगल में कहीं एक धीमी बिगुल-ध्वनि गूँज रही है।
अंकल सैम विस्मित हैं—यह कैसी कायापलट है! यह किस तूफ़ान की आहट है? एक अजीब-सी हतप्रभता छा गई है।
जंगल चाहे जो हो, पर विचारों का जो कारागार निर्मित किया गया था, उसमें भी अब हलचल मची हुई है। क्या दासों को अपनी ज़ंजीरें अब अर्थहीन प्रतीत होने लगी हैं? क्या उन्हें अपने भीतर की ज्योति का बोध हो गया है?
कोई बड़ा तूफ़ान आने वाला है—संघर्ष और परिस्थितियों की कोख से एक नए विश्व-व्यवस्था का जन्म होने को है। प्रसव-कक्ष में डॉक्टरों और नर्सों की भागदौड़ बढ़ गई है—औज़ार तेज़ करो, कैंची लाओ, बर्तन कहाँ है, तौलिये सजाओ, इनक्यूबेटर तैयार रखो… और यदि बिजली चली जाए तो आपातकालीन प्रकाश भी तैयार रहे—सुरक्षित जन्म अत्यंत आवश्यक है!
Mahabharata का युद्ध यदि आप आरंभ कर दें, तो फिर उसके सुखद अंत पर आपका नियंत्रण नहीं रहता। युद्ध के अठारह दिन—18×18×18—अनगिनत संभावनाओं में बदल जाते हैं, जैसे बिना ब्रेक की दौड़ती हुई रेल—
हम कहाँ आ पहुँचे हैं?
युद्ध के भौतिक पक्ष तो होते ही हैं, जो दिखाई देते हैं, पर उसका एक गहरा आयाम भी होता है—आत्मिक मुक्ति का। आपने मनों पर अधिकार कर रखा था, पर मन अब स्वतंत्र होना चाहते हैं। आप कब तक दूसरों को अपने अधीन रख पाएँगे? विद्रोह, जिसका उद्गम मानव-मन है, एक दिन थककर भी स्वतंत्रता का उन्मत्त नारा लगा ही देता है!
वर्तमान विश्व-परिदृश्य कहीं न कहीं उस घुटन से मुक्ति का उद्घोष भी है, जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हर चिंतनशील मन अनुभव कर रहा था। और आर्य—वे तो लिखित इतिहास के आदि चिंतक हैं। चिंतक—याद रहे, William Shakespeare ने उन्हें समाज का सबसे “खतरनाक” वर्ग कहा है।
दुनिया निरर्थक है—
और दुनिया का अर्थ यही है
कि हमें उससे आशा बनाए रखनी होगी!
क्या पूर्व जाग उठा है?
यदि हाँ—
तो जागरण मंगलमय हो !
धन्यवाद
रूखसार अहमद फारूकी
( गौती वाला ) .
07/04/2026 .