
पिता का पसीना, मां का सोना और व्यवस्था द्वारा जलाई गई चिताएं!
- महेश ठाकरे, संपर्क: 7745823492
लातूर के गातेगांव की वह काली रात... घर के एक छोटे से कमरे में १८ साल की मैथिली पढ़ाई की किताब खोले शून्य नजरों से पंखे की तरफ देख रही थी। उसकी आंखों के सामने से वे दो साल सरसराते हुए गुजर गए; जब गांव में उसका बाप सूखी खेती में सूखे निवाले गले के नीचे उतार रहा था, मां ने शरीर का आखिरी सोना गिरवी रख दिया था, सिर्फ एक ही उम्मीद पर—"मेरी बेटी डॉक्टर बनेगी!" मैथिली ने भी घर की गरीबी देखी थी, दिन-रात एक करके खून का पानी किया था। उसकी योग्यता अटूट थी, लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी यह प्रामाणिक मेहनत दिल्ली-बिहार के वातानुकूलित कमरों में बैठे 'कोचिंग माफिया' और दरिंदों के बाजार में पहले ही नीलाम हो चुकी है!जब टीवी पर 'नीट पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द' की पट्टी स्क्रॉल हुई, तब मैथिली के दिल की धड़कन रुक गई। पिता का पसीना, मां के गिरवी पड़े गहने और खुद की कोयला बनी मेहनत... यह सब एक सेकंड में राख होता हुआ उसे दिखाई दिया। हार के उस भयानक अंधेरे में उस मां की लाडली ने आत्मघाती कदम उठा लिया। जिन हाथों से स्टेथोस्कोप पकड़कर मरीजों की जान बचानी थी, उन्हीं कोमल हाथों ने फांसी का फंदा गले में डाल लिया।यह केवल मैथिली की अकेली चीख नहीं है; यह इस व्यवस्था द्वारा रचा गया एक अघोषित नरसंहार है! परभणी का प्रथमेश राठौड़, जिसने परीक्षा केंद्र से बाहर आते समय मां को डॉक्टर बनने का वचन दिया था, लेकिन पेपर लीक के सदमे से "मां, दोबारा पेपर कैसे दूं?" कहते हुए जहर खा लिया। राजस्थान का प्रदीप मेघवाल, जो दो बहनों की पढ़ाई की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर ३ साल तक सीकर के कमरे में खुद को खपा रहा था, उसने बहनों के सामने ही फांसी लगा ली। उत्तर प्रदेश का रतिक मिश्रा, एक ईंट-भट्ठे वाले का बेटा, जिसके सपनों की एक-एक ईंट इस सिस्टम ने कुचल दी। और कलबुर्गी की वह ९२% अंक हासिल करने वाली अनाम शेरनी... इन सबका गुनाह सिर्फ एक ही था, इन्होंने इस देश की परीक्षा प्रणाली पर और अपनी मेहनत पर अंधविश्वास की तरह भरोसा किया था!
> यह आत्मदाह नहीं है, यह आत्महत्याओं का आंकड़ा नहीं है। यह इस देश की सड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग माफिया के अपवित्र गठबंधन द्वारा मिलकर किया गया 'संस्थागत कत्ल' (Institutional Murder) है!
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देश में 'कॉकरोच क्रांति' का उदय: सत्ता को चुनौती देने वाला 'जेन जी' का ट्रेलर!
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा देश के युवा बेरोजगारों और परीक्षा प्रणाली के कारण झुलसने वाले छात्रों के संदर्भ में की गई टिप्पणी, जेन जी (Gen Z) की 'कॉकरोच क्रांति' (झुरळ क्रांती) का उदय साबित हो रही है। कॉकरोच (झुरळ) एक ऐसा जीव माना जाता है जो बेहद शांत रहता है, अंधेरे में रहता है और चाहे कितना भी कुचला जाए, सहन करता है। लेकिन जब उसकी सहनशीलता का अंत होता है, तब करोड़ों कॉकरोच अंधेरे से उजाले की ओर निकल पड़ते हैं और बड़े-से-बड़े साम्राज्य को कुतर डालते हैं।
आज भारत में इसी अवधारणा से 'कॉकरोच पार्टी' का उदय होता हुआ दिखाई दे रहा है! यह केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों आक्रोशित, उपेक्षित और सिस्टम द्वारा ठुकराए गए 'जेन जी' युवाओं का एक अघोषित, अभेद्य और अप्रत्याशित 'लड़ाकू गुट' तैयार होने की वास्तविकता है।यह केवल 'ट्रेलर' है: आज परीक्षा केंद्रों के बाहर शांति से आंदोलन करने वाला, सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाने वाला युवा मुख्य फिल्म का केवल 'ट्रेलर' दिखा रहा है। जब ईमानदारी से पढ़ाई करने वाले छात्र की योग्यता की नीलामी होती है, तब यह 'कॉकरोच पार्टी' किसी पारंपरिक नेता या पार्टी के झंडे के बिना सीधे सिस्टम पर हमला बोलती है।
सत्ता पलटने की ताकत:
इतिहास गवाह है कि जब शांत बैठा युवा वर्ग एकजुट होकर सड़कों पर उतरता है, तब बंदूकों की गोलियां और सत्ता का घमंड उनके सामने टिक नहीं पाता। 'कॉकरोच पार्टी' की यह ताकत स्थापित राजनीतिक दलों के समीकरणों को एक सेकंड में तहस-नहस कर सकती है; क्योंकि इन युवाओं के पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा है।
'जेन जी' की ताकत: सत्ता पलटने के वैश्विक उदाहरण
आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के युग में जीने वाली युवा पीढ़ी तानाशाही और स्थापित सत्ता के सिंहासन को कैसे आंखों के सामने पलट सकती है, इसके ज्वलंत वैश्विक उदाहरण हमारे सामने हैं:
बांग्लादेश की छात्र क्रांति: सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अन्यायपूर्ण नियमों के खिलाफ जब वहां का आम युवा सड़कों पर उतरा, तब उन्होंने किसी भी ताकत से डरे बिना सीधे प्रधानमंत्री को देश छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। यह संगठित युवाओं की असली ताकत है।
केन्या में युवा असंतोष: सरकार द्वारा थोपे गए दमनकारी करों (टैक्स) के खिलाफ केन्या के 'जेन जी' युवाओं ने सोशल मीडिया का तकनीकी इस्तेमाल करके ऐसा आंदोलन खड़ा किया कि सीधे संसद में घुसकर उन्होंने सरकार को कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
श्रीलंका का जन-आक्रोश: आर्थिक दिवालियापन और भ्रष्ट शासन से त्रस्त युवा पीढ़ी ने सीधे राष्ट्रपति के महल पर कब्जा कर लिया और सत्ता का घमंड चकनाचूर कर दिया।
भारत के शासकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के २४ लाख 'नीट' (NEET) के छात्र और करोड़ों प्रतियोगी परीक्षाएं देने वाले युवा यदि इस वैश्विक क्रांति की राह पर चल पड़े, तो दिल्ली का तख्त बचाना मुश्किल हो जाएगा।
तकनीकी 'लूपहोल्स': डिजिटल इंडिया की आबरू के चीथड़े
परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था (NTA) जब हाई-टेक इंडिया और 'डिजिटल क्रांति' का ढिंढोरा पीट रही है, तो वह इन अपराधियों के सामने घुटने क्यों टेक देती है? इसमें कौन से तकनीकी कारण जिम्मेदार हैं, जिन पर सरकार को तुरंत आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है:
एन्क्रिप्टेड बाजार: पहले पेपर प्रिंटेड रूप में लीक होते थे। अब डार्क वेब और टेलीग्राम के एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड चैनल्स का उपयोग करके महज कुछ सेकंड में पूरे देश में पेपर बेच दिया जाता है। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं के साइबर सेल इन अपराधियों की तकनीक से १० साल पीछे क्यों हैं?
साइबर हाईजैकिंग: प्रश्नपत्रों को परीक्षा केंद्रों पर डिजिटल रूप में भेजते समय वीपीएन (VPN) और सुरक्षित सर्वर का उपयोग करने का दावा किया जाता है। लेकिन, स्थानीय स्तर पर आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर होने के कारण, हैकर्स 'रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर' का उपयोग करके सिस्टम को आसानी से हैक कर लेते हैं।
बायोमेट्रिक और फेशियल स्कैनिंग में कमियां: तकनीकी जांच में ढिलाई के कारण फर्जी उम्मीदवार (मुन्नाभाई) मूल छात्रों की जगह परीक्षा देते हैं।
सीसीटीवी और जैमर्स का ऑडिट: परीक्षा केंद्रों पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरे और जैमर्स तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर ऐन वक्त पर किसके इशारे पर बंद किए जाते हैं, इसका तकनीकी ऑडिट क्यों नहीं होता?
'कोचिंग माफिया' का क्रूर साम्राज्य और सरकार की सफेदपोश ढिलाई
शिक्षा के पवित्र मंदिर वाले इस देश में आज कोचिंग क्लासेस 'मानव कत्तलखाने' बन चुके हैं। इन क्लासेस के संचालक माता-पिता की बेबसी और आकांक्षाओं का व्यापार करते हुए उनसे लाखों रुपये की फीस वसूलते हैं। अपना रिजल्ट चमकाने और अगले साल नए ग्राहक (छात्र) आकर्षित करने के लिए, यही कोचिंग माफिया देश में पेपर सप्लाई करने वाले दलालों और भ्रष्ट अधिकारियों से सांठगांठ करते हैं।
अरबों रुपयों का अनियंत्रित कारोबार होने वाले इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए आज सरकार के पास कोई ठोस कानून नहीं है! ये क्लासेस केवल एक मामूली 'शॉप एक्ट' लाइसेंस पर चलती हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार की नजर में 'शिक्षा' अब ज्ञानयज्ञ नहीं रही, वह महज 'दुकानदारी' बन चुकी है और सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है।
आक्रामक उपाय: अब सिर्फ 'ट्वीट' नहीं, सीधे 'मकोका' चाहिए!
लाखों छात्रों की मेहनत और माता-पिता के खून-पसीने का खेल खेलने वाले इन गिरोहों को नेस्तनाबूत करने के लिए सरकार को अब मरहम-पट्टी बंद करके सीधे सर्जरी करनी चाहिए।
कोचिंग क्लासेस नियंत्रण कानून: सरकारी स्तर से तुरंत कड़ा कानून लागू कर सभी कोचिंग इंस्टीट्यूट्स को सीधे सरकारी नियंत्रण में लिया जाए। क्लासेस की फीस पर अधिकतम सीमा तय हो, बुनियादी ढांचे का ऑडिट हो और वहां छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पेशेवर काउंसलर (समुपदेशक) अनिवार्य किए जाएं।
संपत्ति जब्ती और उम्रकैद: जिस भी कोचिंग क्लास, संचालक या सरकारी अधिकारी की पेपर लीक में संलिप्तता पाई जाए, उस पर 'देशद्रोह' का मामला दर्ज होना चाहिए। उनकी पूरी संपत्ति जब्त कर उन पर बुलडोजर चलाया जाना चाहिए और उन्हें तत्काल उम्रकैद की सजा सुनाई जानी चाहिए।
तकनीकी सुरक्षा: प्रश्नपत्र लीक न हो, इसके लिए 'ब्लॉकचेन तकनीक' का उपयोग किया जाए, जिससे पेपर के हर डिजिटल मूवमेंट को ट्रैक किया जा सके। परीक्षा शुरू होने के महज आधा घंटा पहले डिजिटल 'की' (Key) का उपयोग करके सीधे परीक्षा केंद्र पर ही पेपर प्रिंट किए जाएं, जिससे परिवहन (ट्रांसपोर्ट) के दौरान पेपर लीक होने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाए।
आखिरी सवाल...?
मैथिली की चिता, प्रथमेश के आखिरी शब्द, प्रदीप और रतिक के परिवारों का उजाड़ संसार... यह सब देखकर भी अगर इस देश के शासकों और प्रशासन की आंखें नहीं खुल रही हैं, तो यही कहना पड़ेगा कि हमारी संवेदनशीलता मर चुकी है।
सरकार और नीति निर्माताओं से बेहद आक्रामक और दो टूक सवाल है—आपको बुलेट ट्रेन लानी है, ५ ट्रिलियन इकॉनमी की बातें करनी हैं, वैश्विक महाशक्ति बनने का सपना दिखाना है; लेकिन इस देश के २४ लाख युवाओं की एक परीक्षा आप पारदर्शी और ईमानदारी से आयोजित नहीं करा सकते? अगर आपके सिस्टम के लूपहोल्स (कमियों) के कारण एक किसान के बच्चे का मेहनत से लाया गया ६१० नंबर का स्कोर शून्य हो जाएगा और पैसों के दम पर शून्य पढ़ाई करने वाला डॉक्टर बन जाएगा, तो आपके इस विकास के दावों और डिजिटल भारत की डींगों पर थूकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता!
सरकार अब तुरंत आत्मचिंतन करे, एसी केबिन से बाहर निकले और इस 'कोचिंग माफिया' व 'पेपर लीक गैंग' की कमर तोड़ने वाला कानून जमीन पर लाकर दिखाए।
अन्यथा, बेहद कम समय में पैदा हुई यह 'कॉकरोच क्रांति' और देश में उभर रही यह 'कॉकरोच पार्टी' अगर सड़कों पर उतर आई, तो इस युवा खून की लगी आग आपके सत्ता के सिंहासन को भस्म किए बिना नहीं रुकेगी।