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कवि के कदम: शुभांगी आनंद

कागज की कश्ती पर सवार होकर,

जो जज्बातों के समंदर में उतर जाते हैं,

वो आम नहीं होते शुभांगी,

शब्दान्जली से दिलों को छू जाते हैं।

​कलम जब उठती है समाज के सच पर,

तो पत्रकार का वो निडर रूप लाती है,

और जब बहती है इंसानी जज्बातों में,

तो आनंद बिखेरती एक मुकम्मल कविता बन जाती है।

​अभी तो ये दो पन्ने छपे हैं किसी किताब के,

अभी तो पूरा आसमान नापना बाकी है,

बनारस के घाटों सी सुकून भरी ये लेखनी,

अभी इस जहाँ में अपनी पहचान बनाना बाकी है।

​यूँ ही बहती रहे तुम्हारी ये स्याही,

हर लफ्ज़ में इंसानियत का पैगाम हो,

हमारी आवाज़, हमारी कला और ये कविता,

एक दिन हर जुबां पर शुभांगी आनंद का नाम हो।

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