
जो कहा जाए, वो प्रेम कहाँ,
जिसमें “न” न हो, वो प्रेम कहाँ।
प्रेम संघर्ष का नाम है, मित्र,
जहाँ संघर्ष नहीं, वो प्रेम कहाँ।।
आज प्रेम खेल बन गया है,
जिसे देखो, वो प्रेम कहता है—
“मैं प्रेम करता हूँ।”
कहना प्रेम नहीं,
बिना कहे महसूस कराना ही प्रेम है।।
जो कहता था, “मैंने सच्चा प्रेम किया,”
वो प्रेम नहीं, प्रचार है, मित्र।।