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पुराने पन्ने

कमरे में धुंधली सी खामोशी पसरी थी। बाहर जून की तपती दोपहरी के बाद अचानक आसमान में काले बादलों ने डेरा डाल लिया था और ठंडी हवा की सरसराहट खिड़की के पर्दों को हिला रही थी। कबीर ने चाय का कुल्हड़ मेज पर रखा और अलमारी के उस सबसे ऊपरी, धूल भरे हिस्से की तरफ देखा जिसे उसने सालों से नहीं छुआ था।

​आज घर का वो कोना खाली करना था। सामान समेटते हुए उसकी नजर एक पुराने, चमड़े के जिल वाले रजिस्टर पर पड़ी। उसका रंग उड़ चुका था और किनारों से धागे निकल आए थे। कबीर ने उसे हाथ में लिया, तो उंगलियों पर धूल की एक परत जम गई। उसने धीरे से फूँक मारकर धूल उड़ाई, तो हवा में सूखे गुलाब और पुराने कागज़ की वह सोंधी सी महक तैर गई जिसे वक्त भी नहीं मिटा पाया था।

​यह कबीर की बाईस साल पुरानी डायरी थी। उसके जीवन के वो 'पुराने पन्ने' जिन्हें उसने खुद ही अपनी मर्जी से दफन कर दिया था।

​यादों की पहली दस्तक

​कबीर ने कांपते हाथों से पहला पन्ना पलटा। तारीख लिखी थी—१४ अगस्त २००४।

​नीली स्याही से लिखे शब्द आज भी उतने ही चमकदार थे, जितनी उस दौर की उम्मीदें थीं। पन्ने पर लिखा था:

​"आज उसने कहा कि मेरी लिखी गज़लें उसे सुकून देती हैं। मैंने हंसकर कह दिया कि अगर गज़लें सुकून हैं, तो तुम उस सुकून की वजह हो। उसने अपनी डायरी का एक पन्ना फाड़कर मुझे दिया और कहा—'इस पर अपनी सबसे पसंदीदा बात लिखो।' मैंने लिख दिया—'तुम्हारा साथ।' उसने वो पन्ना इसी रजिस्टर में छुपा दिया था।"

​कबीर की आंखों के सामने बाईस साल पुरानी वो बारिश की शाम जिंदा हो गई। सुहाना मौसम, चाय की टपरी, और उसकी आँखों में चमकते वो मासूम सपने। वह और 'अनामिका' घंटों बैठकर अदब, शायरी और जिंदगी के फलसफों पर बातें करते थे। कबीर तब एक उभरता हुआ लेखक था, जिसके पास जेब में पैसे भले न हों, लेकिन दिल में जज्बातों का समंदर था।

​कसक और अधूरापन

​उसने पन्ना पलटा। आगे के पन्नों में दोनों के दरमियान गुजरी हर छोटी-बड़ी बात दर्ज थी। किसी पन्ने पर सूखी हुई नीम की पत्ती दबी थी, तो किसी पर चाय का गिरा हुआ एक छोटा सा दाग था—जो उस रोज़ हुई किसी खूबसूरत बहस का गवाह था।

​लेकिन जैसे-जैसे पन्ने आगे बढ़े, शब्दों का मिजाज बदलने लगा। साल २००६ के पन्ने भारी थे। उनमें ठहराव की जगह एक अजीब सी छटपटाहट थी। एक पन्ने पर लिखा था:

​"जिंदगी सिर्फ शायरी से नहीं चलती, कबीर। दुनिया बहुत व्यावहारिक है। यहाँ ख्वाबों की कीमत सिक्कों में आंकी जाती है। आज जब उसके घर वालों ने मुझसे मेरी हैसियत पूछी, तो मेरे अलफ़ाज़ मेरा साथ छोड़ गए। वह चुप थी, और उसकी वो खामोशी मुझे चीर रही थी।"

​कबीर ने गहरी सांस ली। चाय अब ठंडी हो चुकी थी। वह जानता था कि उस मोड़ के बाद क्या हुआ था। दुनिया की आपाधापी, करियर बनाने की होड़, और एक अदद 'सफल' इंसान बनने की दौड़ में वह ऐसा भागा कि पीछे मुड़कर देखने का वक्त ही नहीं मिला। उसे रुतबा मिला, पैसा मिला, कामयाबी मिली... पर इस सब की कीमत पर, उसने अपने भीतर के उस लेखक को कहीं खो दिया जो कभी दिल से महसूस कर सकता था।

​डायरी के बिल्कुल आखिर में, एक पन्ना मोड़ा हुआ था। कबीर ने उसे खोला। यह वही पन्ना था जो अनामिका ने अपनी डायरी से फाड़कर उसे दिया था। उस पर कबीर के हाथ से लिखा 'तुम्हारा साथ' तो धुंधला पड़ चुका था, लेकिन उसके नीचे, जुदाई की उस आखिरी रात अनामिका ने छोटे-छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था, जिसे कबीर ने उस वक्त गुस्से और दर्द में शायद कभी ठीक से पढ़ा ही नहीं था।

​वहाँ लिखा था:

​"तुमने लिखा था 'तुम्हारा साथ'... कबीर, साथ सिर्फ हाथों में हाथ होना नहीं होता। जब तुम अपनी मर्जी से लिखे हुए इन पन्नों को सालों बाद पढ़ोगे, तब भी मैं तुम्हारे इन लफ़्ज़ों में जिंदा रहूँगी। हम वक्त को रोकने की कोशिश में खुद को इतना थका देते हैं कि यह भूल जाते हैं कि बहना ही जिंदगी है। मुझसे दूर होकर भी, तुम अपनी इस लिखावट को कभी मत छोड़ना। यही तुम्हारा वजूद है।"

​यह पढ़कर कबीर की आँखों से एक आंसू टपका और सीधे उस पुराने पन्ने पर जा गिरा। स्याही थोड़ी और फैल गई, जैसे बाईस साल पुराना कोई घाव आज जाकर मुकम्मल हुआ हो। कबीर को अहसास हुआ कि जिसे वह अपनी 'हार' समझकर भागता रहा, वो असल में जिंदगी का एक सबसे खूबसूरत खूबसूरत सबक था। उन पुराने पन्नों ने उसे याद दिलाया कि वह आज जो कुछ भी है, उसी अधूरेपन और उसी शिद्दत की बदौलत है।

​बाहर तेज बारिश शुरू हो चुकी थी। बूंदें खिड़की के कांच से टकराकर रास्ता बना रही थीं।

​कबीर ने उस पुरानी डायरी को सीने से लगाया। उसके दिल का बोझ अब हल्का हो चुका था। उसने डायरी को वापस अलमारी में रखने के बजाय अपनी मेज पर, सबसे सामने रख दिया।

​फिर उसने अपनी दराज से एक बिल्कुल नया, कोरा रजिस्टर निकाला। पेन की कैप हटाई और उसके पहले सफेद, उजले पन्ने पर आज की तारीख डाली। कबीर ने मुस्कुराते हुए लिखना शुरू किया:

​"पुराने पन्ने कभी मरते नहीं। वो बस वक्त की धूल के नीचे सो जाते हैं, ताकि जब हम जिंदगी की धूप से थक जाएं, तो उनकी छाँव में बैठकर फिर से जीना सीख सकें..."

​खिड़की से आती ठंडी हवा अब कबीर को उदास नहीं कर रही थी, बल्कि उसके भीतर एक नई कहानी को जन्म दे रही थी।

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