
मैने देखी है हजारों अड़चने ,
कभी सो गई मां भूखी ,
कभी कुछ निवालो में शांत सी रही ।
वो खर्चा सभालती रही ।
धसती रही आत्मा पापा की ,
हड़डिया भी चिपकती रही ।
हाथ पैर सुखड़ कर सब एक हो गए ,
छत घर की टपकती रही ।
कर कुछ इनको दिखाना है ,
पापा को राजा और मां को महारानी बनाना है ।
स्थापित करना है स्वराज्य इनका ,
विरासत में खुशियों का उपहार देना है ।
यूं जो हार जाऊं तो ,
क्या मैं बेटी इनकी कहलाऊगी।
मैंने देखा है इन्हे रात में भी काम करते हुए,
फिर मैं कैसे थक जाऊंगी,
निकली हू अभी तो घर से ,
देखना मंजिल पर भी पहुंच जाऊंगी ।
और कैसे हार जाऊं मैं ,
जवाब मैं जीत की गूज लाऊंगी।