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शीर्षक : अंतर्मन - कुछ अनुभव

हर व्यक्ति अपने विचार को अभिव्यक करने और उसको शब्दों में ढाल लेने का हुनर जानता है यानी हर व्यक्ति में एक लेखक और कवि अंश विद्यमान रहता है मगर परवान नहीं चढ़ पाता । ऐसा न हो पाने का कोई बड़ा कारण नहीं है। गहन अवलोकन किया जाए तो इसमें केवल व्यक्ति की शिथिलता और उसका अपने लेखन को लेकर नियमित या निरन्तर न होना है।

कुछ ऐसा मेरे साथ भी हुआ जब भी मेरे लेखन ने दिशा पकड़ी उसकी धाराएं सुगमता से बहीं उतने में ही किसी बाधा ने आकर रास्ता रोक लिया । इन को देखकर मेरा ठिठक जाना , इनसे विमुख न होकर थोड़ी देर के लिए ही रुक कर अपनी सहमति दे देना। क्योंकि विकल्प थे ; सपने या कर्तव्य। समाज के दबाव में हमेशा कर्तव्य का चयन कर लिया और सपने किनारे रख दिए।

अब सोचती हूं तो अपनी मूर्खता पर दुःख होता है कैसे निर्णय न कर पाई कैसे सपनों के चयन को प्राथमिकता न दे पाई??

क्या होता थोड़ा कम कर्तव्यनिष्ठ होती या जग मुझे उलाहना देता कि स्त्री धर्म निभा नहीं सकी! क्या होता कम सामाजिक या कम कर्तव्य परायण कहलाती ।

कम से कम सपने जी कर ज़्यादा खुश अधिक संतुष्ट हो पाती । मेरी यात्रा आज किसी पुस्तक के आवरण पर अपना पड़ाव तय कर रही होती।

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