
गाँव के एक छोटे से घर में रहने वाला अर्जुन हमेशा दूसरों की बातों में जीता था।
“तू ये नहीं कर पाएगा…”
“ये तेरे बस की बात नहीं…”
ऐसे शब्द उसके आसपास हवा की तरह तैरते रहते थे और धीरे-धीरे उसने उन्हें सच मान लिया था।
अर्जुन को लिखने का शौक था। रात के सन्नाटे में वो अपने मन की बातें कागज़ पर उतारता, पर सुबह होते ही वो कागज़ किसी कोने में छुपा देता। उसे डर था कि लोग हँसेंगे, मज़ाक उड़ाएँगे।
एक दिन, उसके हाथों से लिखी एक पुरानी डायरी उसके पिता के हाथ लग गई।
अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा “अब सब खत्म…”
लेकिन जो हुआ, वो उसने कभी सोचा भी नहीं था।
पिता ने शांत स्वर में कहा,
“ये तूने लिखा है?”
अर्जुन ने सिर झुका कर हाँ कर दी।
कुछ पल की खामोशी के बाद पिता मुस्कुराए-
“इतना कुछ तेरे अंदर है… और तू दुनिया के डर से इसे छुपा रहा है?”
अर्जुन ने पहली बार किसी की आँखों में अपने लिए विश्वास देखा।
उस रात अर्जुन सो नहीं पाया।
उसके अंदर एक जंग चल रही थी-
“क्या सच में मैं कर सकता हूँ?”
“या ये भी बस एक धोखा है?”
और फिर…
सुबह आई।
अर्जुन ने अपनी डायरी उठाई, और पहली बार बिना डरे, बिना छुपाए, गाँव के छोटे से पुस्तकालय में जाकर अपनी रचना सबके सामने पढ़ी।
शुरुआत में कुछ लोग हँसे…
कुछ ने अनदेखा किया…
पर उसने पढ़ना नहीं छोड़ा।
उसकी आवाज़ कांप रही थी, पर शब्द मज़बूत थे।
जैसे-जैसे वो आगे बढ़ा, माहौल बदलने लगा।
खामोशी गहरी हो गई।
और जब वो खत्म हुआ…
तो तालियाँ की गड़गड़ाहट गूँज उठीं।
उस दिन अर्जुन को समझ आया-
डर कभी खत्म नहीं होता,
पर जब इंसान खुद पर भरोसा कर लेता है,
तो डर छोटा पड़ जाता है।
उस दिन अर्जुन ने सिर्फ एक कहानी नहीं सुनाई,
उसने खुद को पा लिया।
और उसी दिन से उसकी दुनिया बदल गई-
क्योंकि उस दिन उसने…
खुद पे भरोसा किया।
लेखक - बनारसी