.........नसीब के धागे.....
दर्द की बस्ती में जब हम घर बनाने लगे,
सुकून ढूंढने निकले तो लड़खड़ाने लगे।
लिखा था सबकी हथेली पे चैन का लम्हा,
मेरी ही बारी पे वो हाथ क्यों खिचने लगे?
तमाम उम्र बुना हमने ख़्वाब का रेशम,
मगर नसीब के धागे ही टूट जाने लगे।
बस जरासी ही देर हुई थी मेरी कहानी में,
कि लोग उठ के जैसे तमाशे से जाने लगे।
अंधेरी रात के साये अब डरा न पाएंगे,
जला के दीप हम खुदको आजमाने लगे।
डॉ. दिलीप चौधरी 'दीप'