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मैं किसान हूं

कविता शीर्षक, मैं किसान हूं

कृषि ऋतु की अधीन है,

हर जोखिम का मैं इम्तहान हूं

रिस्क मेरा कर्म है,

हर मौसम का मैं खलिहान हूं।

मैं किसान हूं मैं,मैं किसान हूं।

फ़सल उगे मुस्किल बड़ी,

रहे मुसीबत सर पे खड़ी।

बारिश न हुए तो सूखे से मर जाए,

बाढ़ आए तो बहाकर ले जाए।

फिर भी कहते हैं लोग मैं बेईमान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

कभी टाइम पर बोली लगे न,

बोली लगे तो तौली लगे न।

खेतों में गरमी ठंडी की मार,

फ़सल को मिले न जगह,

वो मंडी की कतार।

हर मुश्किल में सबकापेट भरूं,

मैं अभिमान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

शीत ऋतु में खेतों को सींचता हूं,

कई कई रातें आंखे न मिचता हूं।

हर वक्त सर्पों के ऊपर से गुजरना,

डाली डाली पे नज़र को रखना।

क्यों जानवर समझते हो मुझको,

मैं भी तो इनसान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

चीरता हूं धरती का सीना,

अन्न की उम्मीद रहती है।

करोड़ों का पेट पालने की,

मन में ज़िद रहती है।

वक्त पर नसीब मुझे हुए न रोटी,

ऐसा मैं दयावान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

हजारों सपने देखता हूं,

फ़सल ए बाली में।

परिश्रम की सुगंध मचले,

डाली डाली में।

धूल मिट्टी वफ़ा है मेरी,

मैं बागबान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

मिट्टी में लथपथ सुबह और शाम,

मेरा लगाव जमीं से।

जब तक न पके फ़सल मेरी,

निकले न मेरा पांव नमी से।

अन्न पानी में करूं न जरा भी मिलावट,

मैं ईमान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

जुगनू के जैसे चमकना रातों को,

हसरत सी बन गई है।

मशक्कत से लहराना खेतों को,

कसरत सी बन गई है।

वाकिफ हूं वक्त की नाइंसाफी से,

बुरे वक्त की मैं पहचान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

लुटेरों की झील से पीते हैं परिंदे,

घाव की घूंट।

अब तक किसी को रास न आई,

मंदे भाव की लूट।

मैं समझ सका न फितरत इनकी,

मैं नादान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

लहराती फसलों में घना,

सुकून है मेरा।

देश को अच्छा अनाज देना,

जुनून है मेरा।

हौसलों के पंख डगमगाते नहीं,

मैं उड़ान हूं।

मैं किसान हूं मैं किसान हूं।

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