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"मैं भी दरिया हूँ..."

"मैं भी दरिया हूँ..."

यह सिर्फ एक जुमला नहीं, कबीर के भीतर सुलगता हुआ वह अंगारा था, जिसे वक्त की धूल और सिस्टम की बंदिशें बुझा नहीं पाई थीं।

कबीर एक सुदूर गाँव के सरकारी स्कूल में शिक्षक था। टूटी हुई छत, ब्लैकबोर्ड के नाम पर पुती हुई काली दीवार और बुनियादी सुविधाओं का अभाव—यह उस स्कूल की हकीकत थी। लेकिन कबीर की आँखों में एक अलग ही चमक थी। वह मानता था कि हर बच्चा एक बीज है, और उसका काम उस बीज को बरगद बनाना है।

पर चुनौतियाँ सिर्फ संसाधनों की नहीं थी। गाँव के कुछ रसूखदार और भ्रष्ट लोग उस स्कूल की ज़मीन को हड़पकर वहाँ एक आलीशान कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाना चाहते थे। उन्होंने कबीर को डराया, धमकवाया, ट्रांसफर की धमकियाँ दीं और यहाँ तक कि उसके चरित्र पर कीचड़ उछालने से भी बाज नहीं आए। कबीर के अपनों ने भी कह दिया—"क्यों इन ताकतवर लोगों से दुश्मनी मोल ले रहे हो? चुपचाप नौकरी करो और घर आओ।"

एक रात, कबीर बुरी तरह टूट चुका था। निराशा के अंधेरे में वह गाँव के किनारे बहने वाली उफनती नदी के पास जा बैठा। रात के सन्नाटे में पानी का शोर गूंज रहा था। कबीर ने देखा कि सामने एक विशालकाय चट्टान खड़ी थी, जो सदियों से अपनी जगह पर अड़ी थी। पानी उस चट्टान से टकराता, बिखरता, लेकिन थमता नहीं था। नदी ने चट्टान से लड़कर अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं की, बल्कि उसने खामोशी से चट्टान के बगल से अपना एक नया रास्ता तराश लिया था। निरंतर बहते रहने के उस सिसकते संकल्प ने अंततः उस कठोर चट्टान को भी बीच से चीर दिया था।

कबीर की आँखों के आँसू सूख गए। उसकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो गई। उसने नदी के पानी को छुआ और उसकी अंतरात्मा से एक चीख निकली:

"तुम मुझे चट्टानों का खौफ मत दिखाओ। रुकावटें जितनी बड़ी होंगी, मेरी रफ्तार उतनी ही तेज होगी। मैं भी दरिया हूँ, अपना रास्ता खुद बनाना जानता हूँ!"

अगली सुबह कबीर एक बदला हुआ इंसान था। उसने शिकायत करना छोड़ दिया, उसने लड़ना छोड़ दिया। उसने दरिया की तरह अपनी ऊर्जा को एक नई दिशा में मोड़ दिया:

खामोश क्रांति: उसने गाँव के कोने-कोने में जाकर 'रात्रि चौपाल' शुरू की। हर उस मजदूर और किसान को जोड़ा, जिसके बच्चे उस स्कूल में पढ़ते थे। उसने उन्हें अहसास दिलाया कि यह लड़ाई सिर्फ एक स्कूल की नहीं, उनके बच्चों के भविष्य की है।

अथक परिश्रम: कबीर दिन में बच्चों को पढ़ाता और रात को खुद जागकर डिजिटल कंटेंट तैयार करता। उसने सोशल मीडिया के जरिए उन बच्चों की असाधारण प्रतिभा को दुनिया के सामने ला खड़ा किया। देखते ही देखते, पूरा जिला उन बच्चों का दीवाना हो गया।

कारवां बनता गया: जब लोगों ने कबीर का यह अडिग संकल्प देखा, तो जो गाँव कल तक डरा हुआ था, वह उठ खड़ा हुआ। छोटी-छोटी धाराएं मिलकर सुनामी बन गईं। रसूखदारों के पैसे और ताकत की दीवार जनसैलाब के आगे ढह गई।

प्रशासन को झुकना पड़ा। न सिर्फ स्कूल की जमीन बची, बल्कि सरकार ने कबीर के विज़न को देखते हुए उस स्कूल को राज्य का सबसे आधुनिक 'स्मार्ट स्कूल' बनाने के लिए करोड़ों का फंड जारी किया।

उद्घाटन के दिन, हज़ारों की भीड़ कबीर को सुनने के लिए बेताब थी। जब कबीर माइक पर आया, तो उसकी आँखों में अहंकार नहीं, बल्कि एक गहरी संतुष्टि थी। उसने सामने बैठे अपने विद्यार्थियों को देखा और बुलंद आवाज़ में कहा:

"रास्तों ने चाहा कि मैं ठहर जाऊँ, दीवारों ने घेरा कि मैं टूट जाऊँ...

लेकिन वो भूल गए कि मुझे बांधने वाले बांध अभी बने नहीं हैं।

जब तक मंज़िल न मिल जाए, थककर बैठना मेरी फितरत नहीं।

तुम अपनी हदें तय करो, मैं तो अपनी सरहदें लांघने निकला हूँ...

क्योंकि मैं भी दरिया हूँ, और दरिया कभी रुका नहीं करते!"

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