
इंसान की न जाने कौन-सी प्रवृत्ति है कि उसकी स्वीकारोक्ति और सराहे जाने की इच्छा कभी खत्म ही नहीं होती। इस धारा पर कभी बंध लग ही नहीं पाता, जबकि परिणाम सबको मालूम है कि यह केवल तनाव देता है, संतुष्टि नहीं। फिर भी सब दौड़े जा रहे हैं, स्वयं को अलग और आकर्षित दिखाने में।
अंतर्मन के भेद खुलने और सहज-सरल बनने में जीवन का बहुत सारा हिस्सा निकल जाता है, और इस निकल जाने को वापस न पाने का जो मलाल है, वह दिल के किसी कोने में अटका-सा रह जाता है।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जहाँ खुद को साबित करने की जो रस्साकशी है, उससे इतर जीवन कितना सरल है—यह जान लेना कितना महत्वपूर्ण है और कितना लाभदायक भी। क्योंकि इसी सरलता से तो दर्शन की गुत्थियाँ सुलझती हैं, सृजन के अंकुर फूटते हैं और मौलिकता का पुष्प खिलता है।
@ अर्शिया अंजुम