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मैंने तुम्हें रोका क्यों नहीं…

:मैंने तुम्हें रोका क्यों नहीं…

मैंने तुम्हें जाते हुए देखा था,

हर कदम के साथ

अपने अंदर कुछ टूटते हुए महसूस किया था…

दिल ने हज़ार बार कहा—

“रोक लो उसे…”

मगर मैंने अपने ही दिल को

खामोशी से मना लिया था।

कह सकती थी— “मत जाओ”,

तुम्हारा हाथ थाम सकती थी…

पर अगर मोहब्बत ही मजबूरी बन जाए,

तो वो मोहब्बत कहाँ रह जाती है?

मैं ठहरी रही उसी एक पल में—

इस उम्मीद में कि तुम मुड़ोगे,

मेरी खामोशी को पढ़ लोगे,

और बिना कहे ही ठहर जाओगे…

पर तुमने तो कदम भी नहीं रोके,

जैसे जाना ही तुम्हारा फ़ैसला था,

जैसे मेरी मौजूदगी

तुम्हारे रास्ते में कभी थी ही नहीं।

और उसी दिन समझ आया—

मैं तुम्हारी कहानी का

बस एक हिस्सा थी…

पूरा किस्सा नहीं।

मैंने तुम्हें इसलिए नहीं रोका,

क्योंकि मैं खुद को खोना नहीं चाहती थी…

किसी की चाहत में इतना भी नहीं झुकना,

कि अपनी ही नज़रों में गिर जाऊँ।

हाँ, दर्द है… बहुत है,

पर इस दर्द में भी एक सुकून छुपा है—

कि मैंने मोहब्बत सच्ची की थी,

पर खुद से बेवफ़ाई नहीं की।

मर्म (Moral):

हर “रुको” कहना मोहब्बत नहीं होता—कभी-कभी जाने देना ही खुद से सबसे सच्चा रिश्ता निभाना होता है।

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