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मैं, मेरा हुमसफ़र… और सीख

मैं, मेरा हुमसफ़र… और सीख

वो रिश्ता जो नाम से मेरा था,

पर एहसासों में कहीं अधूरा था…

मैं निभाती रही हर किरदार,

पर शायद वहाँ मेरा होना ही अधूरा था।

मैंने उसे अपना रब सा माना,

उसकी खुशी में खुद को भुला दिया,

हर खामोशी को इशारा समझा,

और हर दूरी को भी प्यार मान लिया।

पर सच धीरे-धीरे सामने आया,

जब दिल ने खुद को ही रुलाया…

वो साथ होकर भी साथ न था,

और मैं खुद से ही दूर होती गई।

फिर एक दिन थककर रुक गई मैं,

न सवाल बचे, न कोई इल्ज़ाम,

खामोशी ने ही आईना दिखाया—

कि गलत वो नहीं… मैं खुद को भूल गई थी तमाम।

मैंने फिर खुद को समेटा,

हर टूटन को ताकत बनाया,

जिसे हुमसफ़र समझा था कभी,

उसे एक खूबसूरत सबक बनाकर छोड़ आया।

👉मोरल (सीख):

कभी किसी को इतना हक मत दो,

कि वो तुम्हारी पहचान बन जाए,

क्योंकि सच्चा हुमसफ़र वही है—

जो तुम्हें खोने नहीं, खुद से जोड़ जाए।

और याद रखना…

मोहब्बत में खोना गलत नहीं,

पर खुद को खो देना सबसे बड़ी भूल है।

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