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एक संदेश युवाओं के नाम

कविता, शीर्षक, एक संदेश युवाओं के नाम

कहते हैं की बद्दुआ तेज़ाब बनकर,

जला देती है गुनाहों के दरख़्त को।

इंसान क्या भगवान भी माफ़ न करे,

ये दरिंदगी दुष्कर्म जैसी हरक़त को।

दुष्कर्म से बेटियां, घुट घुटकर मरती हैं दिन रात।

माफ़ी के काबिल नहीं, ये दुष्कर्म जैसा अपराध।

ये गलती दोस्तो,बना देती है आसूंओं का तालाब।

जबरदस्ती लगते नहीं,किसी के गेसुओं में गुलाब।

उमर भर के लिए बन जाता है, कांटो का बिस्तर।

तनहाई में ज़ख्म ए,घाव कुरेदे सन्नाटों का नश्तर।

इस आज़ाद वतन में, बेटियां हमारी आज़ाद नहीं।

बुरी आदत छोड़ देंगे हम ,होगा कोई विवाद नहीं।

जब चाहे उखाड़ दिया पन्ना, बेटियां किताब नहीं।

बुरे कर्मों से मिलता किसी को, कोई खिताब नहीं।

आज़ादी से जीने का,हमारी बेटियों को भी हक है।

बिना शिक्षा के ये जिंदगी, सारी बेटियों की नर्क है।

गर्व उन बेटियों पर,ज़माने में जो ऊंचा नाम किया।

घनी मुश्किलें सहकर हासिल सच्चा मुकाम किया।

फूलों की बारिश हुए उनके माता पिता की राहों में।

सच्चे सपने सजाते हैं अपनी बेटियों की निगाहों में।

दुष्ट नीचता उन सपनों को, चकना चूर कर देती है।

तन्हाइयों की दलदल में जीना, मजबूर कर देती है।

जरा सी छेड़खानी बन जाती है,जख्मों की सुनामी।

कोर्ट कचहरी में बन जाती हैं, मुकदमों की कहानी।

गुनाहों की चौखट पे अक्षर, बस कांटे ही मिलते हैं।

कभी ये जुर्म के हिस्से, आपस में बांटे नहीं जाते हैं।

समय सबको अवसर देता है, अच्छे कर्म करने का।

मगर कोई प्रयास न करे ए दोस्तो,दुष्कर्म करने का।

कुछ करना है अच्छा तो, वतन के लिए कर जाओ।बुराई को कहदो अलविदा, राष्ट्र के लिए मर जाओ।

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