
अभिलाषा तो गगन छूने की थी,
आकांक्षा सब कुछ जीत लेने की थी,
सपनों की उड़ान सीमा से परे थी।
किंतु
व्यंजनों की सुगंध,
सफाई की चमक
और सुंदर छवि के प्रयत्न में,
कब महत्वाकांक्षाओं पर धूल जम गई,
जब तक समझने की सुध लेती,
लंबा सफर तय कर गई।
अब जो शेष है,
उससे लड़ने में समय सीमित
और सामर्थ्य कम है।
*@अर्शिया अंजुम*