बहुत साल पहले जब मैं 6-7 साल का था तब मेरी दादी मेरे पिता के सामने अक्सर एक कथन दोहराया करती थी कि "बेटा पकने का बाद फल मीठा और मनुष्य कड़वा हो जाता है" । आज अक्सर मैं अपने पिता से भी वही कथन सुनता हूं तो सोचता हूं कि अंत में क्या सभी बुजर्गो का सरमाया केवल यही कथन होता है ? मैं स्वयं तो कुछ बोल नहीं पता हूँ क्योंकि इस कथन को मैं सच ही पता हूं । जबकि मैं अब स्वयं अपने जीवन कि अपराह्न से संध्या कि ओर अग्रसर हूं और देख पता हूं अपने वर्तमान और भविष्य को तो सोचता हूं, मुझे भी उसी कथन को कंठस्थ कर ही लेना चाहिए ! क्योंकि अब संवाद अदायगी कि बारी मेरी ही तो है ।