
अंतिम भ्रम
मैं अंतिम भ्रम के बारे में सोचता हूँ,
अंतिम मूर्ति के बारे में।
जब तुम मूर्तियों, छवियों और आदर्शों से परिचित हो जाते हो,
वे तुम्हें तोड़ते हैं या तुम उन्हें तोड़ते हो —
यह एक ही बात है।
पर यदि तुम इस कार्य पर आगे बढ़ते हो,
तो हथौड़ा साथ रखना ज़रूरी है,
और उसे थामे रखने की ताक़त भी।
हथौड़ा चलाते-चलाते
तुम सभी दृश्यमान चीज़ों को तोड़ देते हो,
लेकिन कुछ अदृश्य भी होते हैं,
जो तुम्हारी आस्तीनों में छिपे होते हैं,
तुम्हारे दिल में, जैसे प्रियजन।
उन्हें तोड़ना और भी कठिन होता है।
यह एक निरंतर प्रक्रिया है —
उन्हें एक-एक कर नष्ट करने की।
पर आख़िरी कौन है?
तुम जानते हो —
वह तुम हो,
और तुम्हारा स्वयं का अहम
अर्थात
तुम बिना शब्दों के कह रहे हो_____अहम बृह्मसि्म
और तुम्हारे पीछे का भीड़ तंत्र चींख रहा है
महाराज की जय हो !
महाराज की जय हो !!
रुखसार अहमद फारूकी
(गौती वाला ) .