
भीड़ में हम एक 'नकाब' पहनकर चलते हैं ताकि दुनिया को खुश कर सकें। लेकिन अकेले में वह नकाब गिर जाता है। अकेले रहकर इंसान अपनी कमजोरियों को पहचानता है और उन्हें स्वीकार करना सीखता है। यह वह दौर है जहाँ आप अपनी ताकत को बिना किसी की वाह-वाही के महसूस करते हैं।
महफिलों में हम दूसरों की बातें सुनने के आदी हो जाते हैं, जिससे हमारे भीतर का शोर बढ़ जाता है। एकांत उस शोर को 'फ़िल्टर' करता है। जब बाहर सन्नाटा होता है, तब समझ आता है कि असल शांति बाहर की चुप्पी में नहीं, बल्कि मन के ठहराव में है।
📌भीड़ में तो सिर्फ चेहरे नज़र आते हैं,
अकेलेपन में खुद के राज खुल जाते हैं।
वो सबक जो खामोशी ने पढ़ाए मुर्शद,
महफिलों के शोर में अक्सर छूट जाते हैं।
"जब इंसान अकेला होता है, तो वह केवल 'अकेला' नहीं होता, वह अपने 'होने' के सबसे करीब होता है।।"