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पटरियों के बीच बहती जिंदगियां

पटरियों के बीच बहती ज़िंदगियाँ

(एक प्रेरणादायक हिन्दी कहानी)

लेखक: विजय शर्मा Erry

रेलवे स्टेशन केवल ईंट, सीमेंट और लोहे की पटरियों का नाम नहीं होता, वह असल में उम्मीदों का चौराहा होता है। जहाँ कोई सपनों के साथ चढ़ता है, कोई टूटे हुए मन के साथ उतरता है, और कोई अपनी किस्मत बदलने का साहस लेकर आगे बढ़ता है।

आज प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ी ट्रेन भी कुछ ऐसी ही कहानियों को समेटे खड़ी थी।

अनिरुद्ध उसी प्लेटफॉर्म पर खड़ा था—एक साधारण-सा युवक, साधारण कपड़े, पर असाधारण बेचैनी। हाथ में छोटा-सा बैग और दिल में बड़ा-सा डर। छोटे कस्बे में पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी न मिलने की पीड़ा उसे महानगर की ओर खींच लाई थी।

माँ ने जाते समय सिर्फ़ इतना कहा था—

“बेटा, अगर हारने का मन आए, तो याद रखना… हमने तुझे हारने के लिए नहीं पाला।”

ट्रेन की सीटी बजी।

अनिरुद्ध ने गहरी साँस ली और डिब्बे में चढ़ गया।

डिब्बे के अंदर की दुनिया अलग ही थी। सामने वाली सीट पर बैठे एक बुज़ुर्ग अख़बार पढ़ रहे थे। चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ, पर आँखों में अजीब-सी चमक। जैसे जीवन की हर ठोकर ने उन्हें और मज़बूत बना दिया हो। पास की बर्थ पर एक महिला अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। बच्चा बार-बार खिड़की से बाहर झाँक रहा था, मानो दुनिया को पहली बार देख रहा हो।

खिड़की के पास एक युवती बैठी थी—शांत, गंभीर और सोच में डूबी हुई। बाहर दौड़ते खेत, पेड़ और गाँव उसे अपनी ओर खींच रहे थे।

ट्रेन चल पड़ी।

पटरियों पर पहियों की आवाज़ किसी मंत्र की तरह गूँजने लगी—

टक…टक…टक…

अनिरुद्ध को लगा जैसे यह आवाज़ कह रही हो—

चलते रहो… रुकना मत…

कुछ देर बाद चायवाला आया।

“चाय… गरम चाय!”

अनिरुद्ध ने चाय ली। तभी बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर पूछा—

“कहाँ जा रहे हो, बेटा?”

“काम की तलाश में,” अनिरुद्ध ने ईमानदारी से कहा।

बुज़ुर्ग ने अख़बार मोड़ा और बोले—

“काम तो बहाना है, असली यात्रा तो खुद को खोजने की होती है।”

यह वाक्य अनिरुद्ध के भीतर उतर गया।

रात धीरे-धीरे गहराने लगी। डिब्बे में बातचीत कम और सोच ज़्यादा होने लगी। ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी। कुछ लोग उतरे, कुछ नए चेहरे चढ़े—हर चेहरा एक नई कहानी।

अनिरुद्ध की नज़र उस युवती पर गई। वह अब भी खिड़की से बाहर देख रही थी।

“आप बहुत ध्यान से बाहर देख रही हैं,” अनिरुद्ध बोला।

वह मुस्कुराई, “क्योंकि बाहर ज़िंदगी भाग रही है… और मैं समझना चाहती हूँ कि वह मुझे कहाँ ले जा रही है।”

उसका नाम नंदिनी था। वह अपने पिता से मिलने जा रही थी, जिनसे वर्षों से बोलचाल बंद थी।

“ग़लतफ़हमियाँ भी रेल की देरी जैसी होती हैं,” उसने कहा,

“अगर समय पर साफ़ न हों, तो सफ़र लंबा हो जाता है।”

रात के अंधेरे में ट्रेन तेज़ दौड़ रही थी। बाहर कभी-कभी छोटे-छोटे गाँवों की रोशनी दिख जाती—मानो कह रही हो, हम भी यहीं हैं, संघर्ष में, पर ज़िंदा हैं।

अचानक तेज़ झटका लगा। ट्रेन रुक गई।

घोषणा हुई—

“तकनीकी कारणों से ट्रेन कुछ समय के लिए रुकी रहेगी।”

डिब्बे में बेचैनी फैल गई।

कोई गुस्सा करने लगा, कोई समय को कोसने लगा।

पर बुज़ुर्ग शांत बैठे थे।

अनिरुद्ध ने पूछा, “आपको चिंता नहीं हो रही?”

बुज़ुर्ग मुस्कुराए,

“बेटा, ज़िंदगी में जो रुकावटों से घबरा जाए, वह कभी मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ट्रेन रुकी है, सफ़र नहीं।”

इसी रुकावट में लोग खुलने लगे।

महिला ने बताया कि उसका पति शहर में मज़दूरी करता है।

“मैं चाहती हूँ,” वह बोली,

“मेरा बेटा पढ़-लिखकर ऐसा बने कि उसे मजबूरी में नहीं, गर्व से ट्रेन में बैठना पड़े।”

अनिरुद्ध की आँखें नम हो गईं।

उसे अपनी माँ की बातें याद आ गईं।

कुछ देर बाद ट्रेन फिर चल पड़ी।

सूरज निकल आया था। उसकी रोशनी ने सबके चेहरों को चमका दिया।

अब अनिरुद्ध के मन का डर बदल चुका था—वह डर अब हिम्मत बन रहा था।

मंज़िल आने लगी।

लोग उतरने लगे।

बुज़ुर्ग ने जाते-जाते कहा—

“याद रखना, बेटा—

ज़िंदगी की रेल में टिकट किस्मत देती है,

पर सीट मेहनत दिलाती है।”

नंदिनी ने कहा—

“आज इस सफ़र ने मुझे सिखा दिया कि रिश्तों में भी पहला क़दम खुद ही बढ़ाना पड़ता है।”

अनिरुद्ध प्लेटफॉर्म पर उतरा।

चारों ओर शोर, भीड़ और संघर्ष था—पर अब उसका सिर झुका नहीं था।

उसने मन ही मन कहा—

“मैं हारने नहीं, सीखने आया हूँ।

और जो सीख लेता है, वही जीतता है।”

ट्रेन सीटी बजाकर आगे बढ़ गई।

पटरियों के बीच बहती ज़िंदगियाँ फिर किसी और को प्रेरित करने निकल पड़ीं।

और अनिरुद्ध—

अपने सपनों की ओर पहला सच्चा क़दम बढ़ा चुका था।

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