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पूनम का चाँद

तुम आए हों छत पर

मुद्दतों के बाद..

तुम्हें क्या पता?

इन आँखों ने बरसों

इंतज़ार किया हैं..

घणा अंधेरा.. सुनसान रातों की तनहाई

यादों की महकती करवटे

मिलन की आस लिए बैठे..

बेचैन तरसती बाहें..

अब बस यहीं आरजू है

गले लगाकर सिमट जाओ

दुरिया जो हमे थीं अनकही

मिटा दो सारी..

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