
तुम्हें चाहना शायद मेरा सबसे बड़ा गुनाह था,
और उसी गुनाह में मेरी पूरी इबादत छुपी थी।
मैंने कभी तुम्हें पाने की दुआ नहीं माँगी,
बस इतना चाहा था कि तुम मुस्कुराओ,
और मेरी दुनिया रोशन हो जाए।
तुम्हारे नाम का ज़िक्र आते ही
दिल किसी मंदिर की घंटियों-सा बज उठता था,
मगर होंठों पर हमेशा ख़ामोशी की मोहर लगी रही।
मैं जानता था,
कुछ रिश्ते मुकम्मल होने के लिए नहीं बनते,
वो बस रूह में उतरकर
उम्र भर की तन्हाई का कारण बन जाते हैं।
तुम मेरे पास थीं,
फिर भी मेरे हिस्से में नहीं थीं।
जैसे चाँद हर रात आसमान में दिखता है,
मगर किसी के हाथों में नहीं आता।
मैंने तुम्हारी हर खुशी को
अपनी चाहत से ऊपर रखा,
और यही मेरी हार भी थी,
और मेरी मोहब्बत की सबसे बड़ी जीत भी।
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
कि कुछ लोग ज़िंदगी से नहीं जाते,
बस ज़िंदगी उनके जाने के बाद
पहले जैसी नहीं रहती।
आज भी जब बारिश होती है,
तो भीगी हुई हवाएँ तुम्हारा नाम लिखती हैं,
और मैं उन अक्षरों को छूकर
फिर से टूट जाता हूँ।
तुम्हें भूलने की कोशिश में
मैंने खुद को भुला दिया,
मगर तुम्हारी यादें थीं कि
हर मोड़ पर मेरा इंतज़ार करती रहीं।
कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर मैंने तुमसे अपने दिल की बात कह दी होती,
तो क्या कहानी बदल जाती?
फिर याद आता है,
कुछ कहानियाँ बिछड़ने के लिए ही लिखी जाती हैं,
ताकि मोहब्बत का मतलब
सिर्फ़ मिलना नहीं,
त्याग भी समझा जा सके।
अब लोग पूछते हैं,
"इतना दर्द कहाँ से लाते हो?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
कैसे बताऊँ कि एक लड़की थी,
जिसे मैंने कभी अपना कहा नहीं,
और उसी ने मुझे उम्र भर का शायर बना दिया।
मैं उसके इश्क़ में बदनाम नहीं हुआ,
क्योंकि इश्क़ छुपा रहा,
मगर मेरी रूह जानती है
कि मैंने मोहब्बत की हदें पार की थीं।
आज भी अगर वो सामने आ जाए,
तो शायद मैं कुछ न कहूँ,
बस उसकी सलामती की दुआ करूँ,
और चुपचाप लौट आऊँ।
क्योंकि सच्ची मोहब्बत अक्सर
हासिल करने में नहीं,
खो देने के बाद भी
दुआ बनकर जीने में होती है।
मैं गुनहगार था,
क्योंकि मैंने बेइंतहा मोहब्बत की थी।
और अगर मोहब्बत गुनाह है,
तो हाँ...
मैं आज भी
उस गुनाह का देवता हूँ।
**"कुछ इश्क़ मुकम्मल होकर ख़त्म हो जाते हैं,
और कुछ अधूरे रहकर अमर हो जाते हैं।"** ❤️🩹