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मेरा विस्तार बन जाना…

जब मैं रेत बनजाऊँ,

तुम मौन पवन बन जाना,

मेरे बिखरे कण-कण में,

अपना स्पर्श जगा जाना…जब मैं जल बनूँ,

तुम लहरें बन जाना,

मेरे बहाव में खोकर,

मुझे ही किनारा बना जाना…

जब मैं दीप बनकर जलूँ,

तुम अँधेरा ही बने रहना,

ताकि मेरी लौ को भी,

अपना वजूद मिल सके...

जब मैं राहगीर बनूँ,

तुम मेरी मंज़िल बन जाना,

थक जाए जब कदम मेरे,

तुम मुझे घर सा अपनाना…

जब मैं खामोशी बन जाऊँ,

तुम आवाज़ बन जाना,

मेरे हर अनकहे शब्द को,

अपने लफ्ज़ों में ढाल जाना…

जब मैं संबंध बन सिमटने लगूँ,

तुम उसे विस्तार बना जाना…

जब मैं सितारा बनूँ,

तुम आकाश बन जाना,

मेरी छोटी सी चमक को,

अपनी अनंतता में सजा लेना…

जब मैं सपना बन जाऊँ,

तुम नींद बन जाना,

हर रात मुझे अपनी पलकों पर,

चुपके से सजा लेना…

और जब मैं बस “मैं” रह जाऊँ,

तुम “तुम” ही बने रहना,

क्योंकि हर रूप बदल जाए,

पर साथ हमारा न बदलना…

मेरी क्षीण ज्योति को भी,

अपनी नीरवता में सजा लेना…

तुम मेरा विस्तार बन जाना…

तुम मेरी अनंतता बन जाना !

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