
समझ नहीं आता यार,
कैसे दुनिया में इंसानों को देखते–देखते
किसी एक इंसान में
हम अपनी पूरी दुनिया देखने लगते हैं।
भीड़ होती है चारों तरफ़,
चेहरे हज़ारों नज़र आते हैं,
पर दिल उसी पर रुक जाता है
जिसमें सुकून के मायने आते हैं।
वो हँस दे तो दिन सँवर जाता है,
वो उदास हो तो दिल बिखर जाता है,
उसके हर एक एहसास से
हमारा पूरा वक़्त जुड़ जाता है।
सब कुछ होते हुए भी
कुछ कमी–सी लगती है,
और उसके साथ होते ही
ज़िंदगी पूरी–सी लगती है।
कल तक जो बस एक नाम था,
आज वही दुआ बन जाता है,
अजनबी–सा जो चेहरा था,
वही पूरी दुनिया बन जाता है।
ना कोई वादा, ना कोई क़सम,
फिर भी रिश्ता गहरा होता है,
शायद इसी को मोहब्बत कहते हैं
जब एक इंसान ही सब कुछ होता है।
- प्रतीक संजू जायसवाल