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मन का पाखी

जब-जब रूप निहारोगे,

मंत्र मुग्ध हो जाओगे|

दर्पण के सम्मुख जब जाकर,

स्वयं से ही बतियाओगे|

कुछ दिन का बस चक्र ये होगा,

फिर कुछ ऐसा पाओगे,

स्निग्ध सुरम्य मनोरम काया,

फिर कहां से लाओगे|

दर्पण तुम्हें डराएगा,

समय तुम्हें हराएगा,

मां का पाखी उड़ जाएगा,

तन मिट्टी हो जाएगा||

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