
जिंदगी का जुगाड़...!
शाम के सात बज चुके थे। अमरावती बस स्टैंड पर मुसाफिरों की गहमागहमी थी। आसमान में काले बादल घिरे थे और ऐसा लग रहा था कि किसी भी वक्त मूसलाधार बारिश शुरू हो जाएगी। रमेश अपने पुराने सूटकेस पर बैठा घड़ी देख रहा था। उसे रात की स्लीपर बस पकड़नी थी, लेकिन ऐन वक्त पर खबर आई कि बस तकनीकी खराबी के कारण दो घंटे लेट है।
रमेश एक मिडिल क्लास परिवार का सीधा-साधा इंसान था, जिसकी पूरी जिंदगी 'बजट' और 'शेड्यूल' के कड़े नियमों से बंधी थी। बस लेट होने की खबर से वह परेशान हो उठा। उसका मूड खराब होने लगा।
तभी उसके पास आकर बैठे एक बुजुर्ग शख्स ने मुस्कुराते हुए अपनी चाय का कुल्हड़ आगे बढ़ाया, "शक्ल से तो आप चाय के शौकीन लगते हैं भाईसाहब! लीजिए, मिजाज थोड़ा ठीक हो जाएगा।"
बुजुर्ग की आंखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर बेफिक्री थी। उनका नाम था जगन्नाथ जी। रमेश ने चाय थामी और अपनी झुंझलाहट निकालते हुए कहा, "क्या जिंदगी है! कभी कुछ वक्त पर नहीं होता। सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई।"
जगन्नाथ जी हल्के से हंसे और बोले, "बाबूजी, जिंदगी कोई ट्रेन या बस नहीं है जो हमेशा पटरी पर या टाइम-टेबल से चले। जिंदगी तो एक बहती नदी है, जहां हर मोड़ पर रास्ता खुद बनाना पड़ता है। इसी को तो कहते हैं—**जिंदगी का जुगाड़!**"
मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर याद करते हुए उन्होंने कहा:
"सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम्हें पसंद हो खुद को बदल सको तो चलो।"
पहला जुगाड़: नजरिए का
रमेश को बात थोड़ी गहरी लगी। उसने पूछा, "लेकिन चाचा, जुगाड़ तो एक शॉर्टकट है, कामचलाऊ रास्ता है। क्या पूरी जिंदगी कामचलाऊ तरीके से जी जा सकती है?""यही तो गलतफहमी है बाबूजी," जगन्नाथ जी ने अपनी जेब से एक पुराना, मुड़ा हुआ चश्मा निकाला जिसके एक कोने पर धागा बंधा हुआ था। "लोग समझते हैं कि जुगाड़ का मतलब है कबाड़। लेकिन असल में जुगाड़ का मतलब है—**सीमित संसाधनों में असीमित उम्मीदें ढूंढना।** यह मजबूरी नहीं, यह इंसानी दिमाग की वो रचनात्मकता है जो संकट के समय सबसे पहले जागती है।"
उन्होंने रमेश को समझाया कि जब जेब खाली हो और दिल में कुछ बड़ा करने का हौसला हो, तब जो रास्ता निकलता है, वही जुगाड़ है। इस बात पर बशीर बद्र साहब की ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं:
"जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता।
जहाँ तिनका भी काम कर जाए,
वहाँ तलवार का क्या काम।"
जहां बड़ी-बड़ी डिग्रियां और पैसा हार जाते हैं, वहां इंसान का आम सूझबूझ और 'मैनेजमेंट' काम कर जाता है।
दूसरा जुगाड़: उम्मीद और हौसले का
बातचीत आगे बढ़ी, तो रमेश ने अपनी जिंदगी के तनाव साझा किए—नौकरी की अनिश्चितता, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, और हर महीने का घटता बजट। उसे लगा था कि वह अकेला ही इस चक्की में पिस रहा है।जगन्नाथ जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, "बेटा, जब समंदर में तूफान आता है, तो बड़ी-बड़ी नावें डूब जाती हैं, लेकिन एक छोटा सा तिनका तैरता रहता है क्योंकि वह पानी की लहरों के साथ मुड़ना जानता है। हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा जुगाड़ क्या है, जानते हो? हमारा भरोसा!"
जब चारों तरफ अंधेरा हो, तब खुद को यह समझाना कि 'यह वक्त भी गुजर जाएगा', दिमाग का सबसे बेहतरीन जुगाड़ है। दुष्यंत कुमार जी की इन अमर पंक्तियों में वही हौसला झलकता है:
"कौशिश कर, हल निकलेगा,
आज नहीं तो, कल निकलेगा।
अर्जुन के तीर सा सध,
मरुस्थल से भी जल निकलेगा।"
तीसरा जुगाड़: 'अरे, देख लेंगे!'
"क्या बात कही है चाचा!" रमेश के चेहरे की शिकन अब गायब हो चुकी थी। बारिश शुरू हो चुकी थी, लेकिन अब उसे बस के लेट होने का मलाल नहीं था। वह इस पल का आनंद ले रहा था।
जगन्नाथ जी ने बात को समेटते हुए कहा, "याद रखो रमेश, हर ताले की चाबी बाजार में नहीं मिलती। कुछ चाबियां हमें खुद के तजुर्बों की भट्टी में ढालनी पड़ती हैं। भारतीय आदमी का सबसे बड़ा मंत्र क्या है?—**'अरे, देख लेंगे!'** यह शब्द लापरवाही नहीं है, यह जिंदगी की बड़ी से बड़ी मुश्किल के गाल पर एक करारा थप्पड़ है, जो कहता है कि तू चाहे जितनी मुश्किलें ला, हम मुस्कुराकर रास्ता निकाल ही लेंगे।"
तभी लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई कि रमेश की बस प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर आ चुकी है।
रमेश खड़ा हुआ, उसने जगन्नाथ जी के पैर छुए। अब उसके सूटकेस का वजन उसे भारी नहीं लग रहा था, और न ही बारिश से कोई चिढ़ थी। उसने मुस्कुराकर अपनी छतरी खोली (जिसका एक तार टूटा हुआ था, पर उसने उसे एक सेफ्टी पिन से संभाल लिया था)।
चलते-चलते रमेश ने मुड़कर देखा और मन ही मन बुदबुदाया कि जिंदगी वाकई कोई मुकम्मल किताब नहीं है, जिसे शुरू से अंत तक एक जैसा पढ़ा जाए। यह तो हर रोज लिखे जाने वाले पन्नों की तरह है।
इस कहानी का सार बस इतना ही है कि परेशानियां तो हर राह में मिलेंगी, लेकिन अगर आपके पास 'जुगाड़' का हुनर और मुस्कुराने की आदत है, तो आप हर सफर का मजा ले सकते हैं। जैसा कि किसी ने खूब कहा है:
"ज़िंदगी एक हसीं ख़्वाब है दिल लगा के जियो,
ग़म का दरिया है तो क्या, मुस्कुरा के जियो।
जो तुम्हारा है वो कल भी तुम्हारा होगा,
बस आज के इस पल को, अपना बना के जियो।"