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गीत - हौले हौले जीवन कीबांसुरी बजाया

हौले- हौले जीवन की बाॅंसुरी बजाइये। मीठ- मीठे राग में मधुर गीत गाइये।।

हौले- हौले...

कंठ में माॅं शारदे की वीणा जैसी तान हो,

धारों पर कोयल और भ्रमर सा गान हो,

पीड़ा और कष्ट में पुष्प सी मुस्कान हो श्वांस-श्वांस नेकी, नेह, प्रीत का उफान हो,

देहरी-देहरी दीप बन उजियारा फैलाइए,

हौले- हौले...

फैला हुआ अंबर सीखाता है विराटता ममता भरी गोद दे यह धरा की विशालता,

सूर्य, धूप, वर्षा मेल इंद्रधनुष संवारता, चंद्रमा संग चांदनी के शीतलता पसारता,

अहर्निश प्रकृति से प्रेरणाऍं पाइये।

हौले- हौले...

अंधेरों की और ओट में पिशाच सिर उठाते हैं,

नौंच- नौंच कलियों की आत्मा दुखाते हैं,

जाति, धर्म, वर्ग के नाम पर प्राणी सताते हैं ,

आतंक और घृणा में निर्दोष मारे जाते हैं,

वेदना की अपराधी ऋतुऍं मिटाइए।

हौले- हौले...

एक-एक दिवस बना लो त्यौहार सा, बीता जो संभालो अनुभव स्मृति के हार सा,

पलकों पे टाॅंग लो, विश्वास बंदनवार सा, जीवन को मान लो, प्रभु के उपकार सा।

दूजों के हित सेवा का सितार बन जाइए।

हौले- हौले...

मृत्यु की नदी में प्राण पंछी जो बह जाऍंगे, धन हो, महल हो, यहीं पर रह जाऍंगे, बही खाता कर्म और व्यवहार सह आऍंगे, अनजाने भविष्य के स्वप्न रह जाऍंगे,

जिओ वर्तमान में, सत्य के पग बढ़ाइये।

हौले- हौले जीवन की बाॅंसुरी बजाईये। मीठे- मीठे राग में मधुर गीत गाइये।।

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