
अब तो मानो संवाद भी एक व्यवसाय बन चला है—
किसी से कहना, किसी को सुनना,
जीवन-निर्वाह का एक साधन!
सुना था कि लंदन में भारतीय विद्यार्थी
वृद्धों को पुस्तकें सुनाकर,
उनके क्षणों को सहलाकर,
कुछ धन अर्जित कर लिया करते थे।
आज एकांत
एक वैश्विक व्यथा बनकर उभर आया है—
मानो दिशाओं में नृत्य करता हुआ!
यह कैसा मिलन?
लगता है एकांत ने ही
मिलन का वेश धर लिया है—
तेरे क्षणिक सान्निध्य को
हम भी क्या समझ पाए!
एक ग़ज़ल की प्रतिध्वनि सुनाई देती है—
न तुम हो, न ग़म, न मदिरा की छाया,
ऐसी एकांतता का कोई उत्तर नहीं।
और कभी—
जब सुनसान रात्रियों में मन व्याकुल हो उठता है,
हम तुम्हारी स्मृतियों की चादर
ओढ़ लेते हैं।
किन्तु कुछ जन ऐसे भी हैं
जो इस एकांत को ख़लवत—
एक साधना, एक अंतराल—
में रूपांतरित कर लेते हैं।
अल्लामा इक़बाल के निकट यह ख़लवत
ख़ुदी की अभिव्यक्ति है—
जबकि अन्य कवियों के लिए
यह विरह और स्मृति का प्रदेश रहा है।
यह ख़ुदी—अर्थात् आत्मबोध—
ज्ञान और अनुभूति की आधारशिला है;
और आत्मबोध ही
ईश्वर-बोध की
मूल कुंजी है।
निस्संदेह, एकांत प्रारंभ में
असह्य प्रतीत होता है;
पर यदि कोई उसे लाँघ जाए,
तो वही एकांत
अनंत सौंदर्य का द्वार बन जाता है—
ऐसा आनंद, ऐसी पुलक—
जिसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं,
मानो गूँगे का गुड़!
यह उल्लास, यह भावावेश—
जिसे “वज्द” कहें—
विश्व की महान काव्यधारा में
कहीं-कहीं झलकता है।
किन्तु हर चित्र को
एक फ़्रेम चाहिए,
और हर अनुभूति को
विस्तृत अभिव्यक्ति—
जिस प्रकार श्वेत रंग में
समस्त वर्ण समाहित होते हैं,
वैसे ही मौन में
सभी सुर निहित रहते हैं।
किन्तु जैसे ही सुरों को वाणी मिलती है,
उनका जादू क्षीण होने लगता है।
एकांत का सौंदर्य—
अकथनीय है,
जैसे उसकी पीड़ा भी।
मरुस्थलों की धूल छानना
केवल मजनूँ का ही भाग्य है—
हृदय की व्याकुलता, प्राणों की तृष्णा
कभी रोकी नहीं जाती;
कोई लैला
दीवारों में कैद नहीं होती।
तो क्या सभी गीत
एकांत की करुण पुकार हैं?
संभव है—
और महाकाव्य?
शायद वे भी
एकांत के सौंदर्य का
विराट आख्यान हों!
____रुखसार अहमद फारूकी
( गौती वाला ) .
03/04/2026, .