
दिनाँक_02_06_2026
स्वरचित
जिस घर को बनाने में उस पिता की जिंदगी निकल गई l
उस घर को सजाने संवारने में माँ की पूरी उम्र गुजर गई l
छोटे से बड़े हुऐ बच्चे सभी हसते खेलते जिंदगी बन गई l
दिनरात गूंजती हँसी किलकारी वहाँ अब खामोशी बस गईं l
था यह घर सपनो का अपनों का वहां की अब तख्ती बदल गई
पिता के कांधे झुके माँ के हाथ कांपे बच्चों की फितरत बदल गई l
जिन कंधों पर बेठ दुनिया देखी दुनिया में वो अब बोझ बन गए l
जिन हाथों कि उँगली थामे चलना सीखा दो कदम चलने को वो मोहताज हों गई l
शरीर ने जब साथ छोड़ा अपनों ने हाथ छोड़ा दुनिया बेगानी हो गई l
उनका अपना ही घर पराया हुआ जिंदगी अकेलेपन की आदी हों गई l
भरे पूरे घर में एक कमरे में दोनों की जिंदगी खामोशी की चादर ओढ़े खो गई l
बच्चों के सपने पूरे करने में अपना जीवन वारा उनके लिए इनकी जिंदगी बोझ हों गई l
छोड आए बहाना बना कर वृद्धाश्रम देकर दिलासा जल्दी आने का बात वो झूठी हो गई l
करते इंतजार दिन रात महीनों साल तकती आँखे आँसुओं में डूब गई l
आज नहीं तो कल आएगा लेने कोई अपना बुढ़ी आँखों की उम्मीद अब खो गई l
हम उम्र हमदर्द है वहां सभी पर सब अनजाने है अब प्रीत उनके दर्द से जुड़ गई l
हर शाम की आस धुंधली हो गई आँखों की रोशनी भी अब अँधेरे में बदल गई l
फोन की घंटी बजे एक आस मन मे उठती है पुकारे कोई वो शब्द (माता-पिता)जिसे सुनते जिंदगी गुजर गई l
अलमारी में रखी तस्वीरे अब धुंधली पड़ गई दवाइयों की जिंदगी को लत लग गई l
अब बस शून्य में निहारती आँखें हैं वज़ूद इनका आश्रम की चार दीवारी रह गई l
रोती आँखे तकती राहें टूटीआस अब टूटी सांसे अकेलेपन की घुटन जान इनकी ले गई l
दोनों जन्मों-जन्मों के साथी एक के विरह में जान दूजे की भी चली गई l
मरते क्या ना करते अपनों की अवहेलना जीते जी दोनों को मार गई l
शरीर तो अब गया आत्मा तो बच्चों के व्यवहार के कारण कब की मर गई l
आखिरी वक़्त में कोई अपना नहीं कितने कष्ट से प्राण निकले रूह भी कांप गई l
ना आया कोई देखने पहले ना अंतिम दर्शन के लिए मजबूरियां बच्चों की उनसे( माता-पिता)बड़ी हो गई l
करवा दी अंतिम रस्म भी वीडियो कॉल पर आश्रम वालों से जिम्मेदारियाँ उनकी पूरी हो गई l
अब करो श्राद्ध,पूजा पाठ,ब्राह्मण भोज, छप्पन भोग लगाओ तड़पती रूह उनकी अब चली गई l
काजल मनीष जैन
राजस्थान