
हर एक हक़ीक़त...
ना छोटी होती है, ना बड़ी होती है।
पर ज़िंदगी है — मौत का भी कोई भरोसा नहीं...
ख्वाहिशें बड़ी हैं, सपने बड़े हैं,
पर मोड़ों का कोई भरोसा भी तो नहीं।
आख़िर कहाँ है मंज़िल...
पूरी होगी या नहीं...
कुछ पता भी तो नहीं।
टूटे हैं कुछ इस कदर,
अब भरोसा बाकी है या नहीं —
ये पता भी तो नहीं।