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चलिये तो कट ही जाएगा सफ़र

यद्यपि यह बहार (बसंत) का मौसम है। पेड़ों पर कोंपलें निकल रही हैं और नई पत्तियाँ आँखों को सुकून दे रही हैं—लेकिन मौसम भी तेज़ी से बदलाव की ओर बढ़ रहा है। फिर भी यह सब जिस तरह धीरे-धीरे होता है:

उठेंगे परदे बाम-ओ-दर आहिस्ता-आहिस्ता

फ़ितरत आहिस्ता-ख़राम है—कण-कण का नृत्य एक खास लय और सुर-ताल के साथ चलता रहता है!

पार्क की सुबह बहुत मनमोहक होती है। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को संगीतात्मक बना देती है। इसमें न शोर है, न कोलाहल, बल्कि एक मधुर, धीमा सा स्वर है जो एक विशेष प्रकार के आनंद का कारण बनता है।

हम में से अधिकांश ने अपने बचपन में धीमी आँच पर पका हुआ पौष्टिक भोजन खाया है, लेकिन जिस तरह फ़ास्ट फ़ूड घरों में दाख़िल हुआ है, उसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं।

ज्ञान और समझ का सफ़र भी एक क्रमिक, जीवनभर चलने वाला सफ़र है—बल्कि Allama Iqbal के अनुसार:

“मानसिक विकास वह प्रक्रिया है जो मृत्यु के बाद भी जारी रहती है।”

आज जिस तरह AI हर सवाल का तुरंत जवाब देने के लिए तैयार बैठा है, वह ज्ञान तो दे सकता है, लेकिन बुद्धि (विवेक) नहीं। ज्ञान से आप एक शानदार नौकरी पा सकते हैं, लेकिन स्थायी मुक्ति तो कदम-दर-कदम जागरूकता के सफ़र से मिलती है। यही आत्म-जागरूकता मुक्ति की नींव है। सोच और समझ हासिल करने के लिए कोई AI ऐप न बनी है, न बनेगी—यह केवल आपके व्यक्तिगत अनुभवों की व्याख्या से संभव है, जो दिव्य ग्रंथों की रोशनी में ही समझी जा सकती है। सार्वभौमिक नैतिकता (universal ethics) को अपनाकर ही आत्मिक शांति प्राप्त की जा सकती है, वरना केवल खाना-पीना और मर जाना ही मनुष्य का भाग्य रह जाएगा।

वैश्विक संस्कृति या इच्छाओं और लालसाओं पर आधारित सभ्यता जिस तरह पिछली चौथाई सदी में विकसित हुई है, उसने पशुवत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। बाहरी रूप से मनुष्य एक जीव मात्र ही है, लेकिन जो दृश्य सामने है, वह मनुष्य को उसके भीतर और विचारों की ज़रूरतों से अनजान करने पर तुला हुआ है। यह एक सांस्कृतिक संकट है—

वही नाज़ुक शाख पर घोंसला बनाने वाली बात!

ऐसे संकट में धर्म, साहित्य और अन्य ललित कलाएँ ही समाज की गिरती हुई दीवारों को सहारा दे सकती हैं।

New World Order जिस तरह बन रहा है, उसमें रिश्ते, सहानुभूति और मानवता जैसे भाव “पुराने मूल्यों” में गिने जा रहे हैं। मनोरंजन और व्यर्थ गतिविधियों की एक न रुकने वाली बाढ़ घरों में प्रवेश कर रही है। मानव समाज को “dehumanize” करने की प्रक्रिया जारी है—यानी केवल शरीर इंसानी हो, लेकिन भीतर केवल बुराई का शासन हो!

अंधेरा कायम रहे!!

रोटी, कपड़ा और मकान बुनियादी ज़रूरतें तो हैं ही, लेकिन “इंसान” कहलाने का सम्मान सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करता है। और ये मूल्य बाज़ार में बिकते नहीं, इन्हें मानसिक प्रयासों से अर्जित करना पड़ता है—ठीक उसी तरह जैसे धीमी आँच पर पकाया गया पौष्टिक भोजन।

शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात!

चलिये तो कट ही जाएगा सफ़र आहिस्ता-आहिस्ता

हम उसके पास जाते हैं मगर आहिस्ता-आहिस्ता

— Mustafa Zaidi

आदाब अर्ज़

रुख़सार अहमद फ़ारूक़ी

(गोंती वाला)

30/03/2026

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