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नकारा समाज

रवि हर रोज़ की तरह सुबह जल्दी उठा, उम्मीद लेकर कि आज कुछ बदल जाएगा। लेकिन जैसे ही वह घर से बाहर निकला, वही पुराना समाज उसका इंतज़ार कर रहा था—जहाँ लोग बातें ज़्यादा और काम कम करते थे।

गली के मोड़ पर कुछ लोग बैठे थे, किसी की मेहनत पर हँस रहे थे। सामने एक लड़की अपने सपनों के लिए घर से निकली, तो चार लोग उसके चरित्र का हिसाब लगाने लगे। रवि ने देखा, एक बूढ़ा आदमी सड़क किनारे मदद के लिए खड़ा था, लेकिन सबकी नज़रें बस अपने-अपने मोबाइल में गुम थीं।

रवि ने सोचा, “ये वही समाज है जो खुद कुछ करता नहीं, और जो करता है उसे भी करने नहीं देता।”

उसने उस बूढ़े को सहारा दिया, लड़की को आगे बढ़ने के लिए हौसला दिया, और उन लोगों की परवाह करना छोड़ दिया। धीरे-धीरे कुछ और लोग भी उसके साथ जुड़ने लगे।

तभी रवि को समझ आया—

समाज नकारा नहीं होता, हम उसे नकारा बना देते हैं…

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