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खामोश देखभाल”

“खामोश देखभाल”

जब कोई बीमार पड़ता है,

तो लोग फर्ज़ निभाने चले आते हैं,

हाथ में फल, चेहरे पर मुस्कान,

और दिल में बस थोड़ी-सी औपचारिकता लाते हैं।

कुछ देर में माहौल बदल जाता है,

बातों में हल्कापन, हँसी का शोर…

और जो बिस्तर पर पड़ा है,

वो बस देखता रह जाता है उस दौर।

जिसे ज़रूरत होती है सहारे की,

वही सबसे ज़्यादा अकेला हो जाता है,

भीड़ के बीच खड़ा होकर भी

खुद को अनदेखा-सा पाता है।

जो दिन-रात सेवा में लगा रहता है,

उसकी थकान कोई नहीं पढ़ता,

वो भी मुस्कुरा देता है सबके लिए,

पर अंदर ही अंदर चुपचाप टूटता।

हम कहते हैं—रिश्तों में गर्माहट है,

पर सच्चाई कुछ और ही होती है,

जहाँ एहसास कम पड़ जाते हैं,

और दिखावा ही ज़्यादा होता है।

👉सीख (Moral):

सच्ची देखभाल भीड़ से नहीं, एहसास से होती है।

किसी के पास बैठना ही काफी नहीं,

उसे समझना और महसूस करना ही

असल रिश्तों की पहचान होती है।

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