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अल्मोड़ा के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी — कुमाऊँ अल्मोड़ा के स्वतंत्रता सेनानी: बिश्नी देवी शाह एवं बद

भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक लंबी और कठिन यात्रा थी। देश के हर कोने से असंख्य अनसुने नायक एक साथ आए और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष किया। कुमाऊँ के अल्मोड़ा क्षेत्र की पहाड़ियों से दो तेजस्वी व्यक्तित्व भी इन वीरों में शामिल थे—बद्री दत्त पांडे, एक निर्भीक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, तथा बिश्नी देवी शाह, एक सशक्त महिला जिन्होंने औपनिवेशिक शासन और सामाजिक बंधनों को चुनौती देकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। इन दोनों का योगदान दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की दृढ़ता, प्रतिबद्धता और साहस का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बद्री दत्त पांडे: “पहाड़ों की आवाज़” 1882 में अल्मोड़ा में जन्मे बद्री दत्त पांडे इस क्षेत्र के प्रमुख कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी के रूप में उभरे। वे एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी, इतिहासकार और पत्रकार थे। उन्होंने अपनी लेखनी की शक्ति का उपयोग कर उत्तराखंड के लोगों में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न की। पत्रकारिता की विरासत और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष बद्री दत्त पांडे ने ‘अल्मोड़ा अखबार’ नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया और इसके माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध निर्भीकता से आवाज़ उठाई। उन्होंने स्थानीय लोगों पर होने वाले अन्याय को उजागर किया, विशेष रूप से ब्रिटिश प्रशासन और उनके संरक्षण में कार्यरत जमींदारों द्वारा किए जा रहे शोषण को। उन्होंने 1921 के कूली-बेगार आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई—यह आंदोलन ब्रिटिश शासन द्वारा थोपे गए जबरन श्रम के खिलाफ था। इस व्यवस्था के अंतर्गत स्थानीय लोगों को बिना किसी पारिश्रमिक के ब्रिटिश अधिकारियों का सामान ढोने के लिए मजबूर किया जाता था। इस आंदोलन में उनके नेतृत्व और सक्रियता के कारण लोग उन्हें ‘कुमाऊँ केसरी’ (कुमाऊँ का शेर) कहने लगे। उनके प्रयासों से न केवल कूली-बेगार प्रथा समाप्त हुई, बल्कि पहाड़ों में राजनीतिक चेतना का भी उदय हुआ। विद्वान और इतिहासकार सक्रिय आंदोलनकारी होने के साथ-साथ पांडे एक प्रसिद्ध इतिहासकार भी थे। उनकी कृतियाँ, जैसे “कुमाऊँ का इतिहास”, क्षेत्र के अतीत के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। उनका मानना था कि अपने इतिहास को समझना राष्ट्रीय चेतना के निर्माण के लिए आवश्यक है। उनकी विद्वता में देशभक्ति का समावेश था, जिसने आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध विरासत के प्रति जागरूक किया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

बिश्नी देवी शाह: एक निर्भीक महिला क्रांतिकारी थी। इतिहास में प्रायः पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों का वर्चस्व दिखाई देता है, लेकिन बिश्नी देवी शाह अल्मोड़ा की एक निर्भीक एवं प्रेरणादायक महिला थीं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की। 1902 में जन्मी बिश्नी देवी ने 20वीं सदी के प्रारंभिक दौर की कठोर पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी और युवावस्था में ही सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। वे इस क्षेत्र की पहली महिला थीं जिन्होंने महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में भाग लिया और अन्य महिलाओं को भी आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनके साहसी कदमों के कारण उन्हें ब्रिटिश शासन द्वारा कारावास भी भुगतना पड़ी—जो उस समय विशेष रूप से दुर्लभ थी, क्योंकि छोटे और दूरस्थ क्षेत्रों की महिलाओं का राजनीतिक कारणों से जेल जाना असामान्य था। बिश्नी देवी का योगदान केवल भागीदारी तक सीमित नहीं था। वे एक संगठक, प्रेरक और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन गईं। उनके प्रयासों ने क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। महिला नेतृत्व की विरासत बिश्नी देवी शाह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है, विशेषकर दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में। उनके कार्यों ने लैंगिक बाधाओं को तोड़ा और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए नई नींव रखी। बद्री दत्त पांडे और बिश्नी देवी शाह दोनों ही अल्मोड़ा और जनजातीय क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी व्यक्तित्व थे। पांडे के बौद्धिक योगदान और सक्रियता ने कुमाऊँ क्षेत्र में राजनीतिक जागरूकता को आकार दिया, जबकि बिश्नी देवी की दृढ़ इच्छाशक्ति और भागीदारी ने हजारों महिलाओं को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित किया। इन दोनों की विरासत आज भी उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में जीवित है। उनके सम्मान में कई संस्थानों और सार्वजनिक भवनों का नामकरण किया गया है। वे प्रतिरोध की भावना और स्थानीय नेतृत्व की शक्ति का प्रतीक हैं, जिसने राष्ट्रीय भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निष्कर्ष भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी बद्री दत्त पांडे और बिश्नी देवी शाह जैसे क्षेत्रीय नायकों के बिना अधूरी है। उनके साहस, बुद्धिमत्ता और न्याय के प्रति समर्पण ने हिमालयी क्षेत्र में ब्रिटिश शासन को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शहरी कथाओं के प्रभुत्व वाले इस युग में, अल्मोड़ा जैसे स्थानों के स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद करना हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की भावना वास्तव में पूरे भारत में समान रूप से प्रज्वलित थी, जो देश के सबसे दूरस्थ कोनों तक भी पहुँची। उनका जीवन केवल इतिहास की पुस्तकों का एक अध्याय नहीं है, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा है—जो हमें यह सिखाता है कि न्याय और स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए आवाज़, साहस और कर्म कितने महत्वपूर्ण हैं।

दीपक शर्मा

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