
"बचपन से सुना था कि आदतें इंसान की तकदीर बदल देती हैं, पर ये नहीं पता था कि एक छोटी सी आदत मेरी पूरी तस्वीर बदल देगी।
मैं भी हर रोज़ दुनिया की उम्मीदों पर खरा उतरने की दौड़ में भाग रही थी। दूसरों को खुश रखने की उस अधूरी जंग में, जहाँ जीत कर भी मैं हर रोज़ खुद को हार जाती थी। फिर एक दिन, थककर मैंने एक छोटी सी आदत बनाई—'लोगों को बेमन से 'ना' कहना और खुद को पूरे दिल से 'हाँ' कहना।'
शुरुआत में लोग इसे मेरा सलीका कहें या थोड़ा सा स्वार्थ... पर अब मैं खुद को कतार में सबसे आगे रखती हूँ। क्योंकि जो दीया खुद अंदर से खाली हो, वो दूसरों के घर में उजाला नहीं कर सकता। बदलाव कभी बहुत बड़ा नहीं होता, वो तो हमारी छोटी-छोटी आदतों का हिस्सा होता है। मैंने बस दुनिया के शोर को जवाब देना बंद किया और खुद को सुनना शुरू किया... और देखिए, आज पूरी दुनिया ने मुझे सुनना शुरू कर दिया।
जब से दूसरों के चश्मे को उतारकर खुद की कद्र करना सीखा है, यकीन मानिए... जिंदगी का हर पन्ना खूबसूरत लगने लगा है।"