
राजा—
शासन का स्वामी,
शाही घोड़े पर सवार है,
परिधानहीन।
प्रजा भी उसके साथ—
नग्न, निर्विकार,
न कोई संकोच,
न कोई प्रश्न।
आओ, उत्सव मनाएँ,
जय-जयकार करें—
गरिमा तो कब की खो चुकी है!
न कोई पीड़ा,
न कोई झिझक,
सब कुछ सहज मान लिया गया है—
यही तो है
राज करने का ढंग,
और राज सहने का भी!
रुखसार अहमद फारुकी
बेंगलुरू